10/31/2014

दुनिया को खत्‍म करने वालों के खिलाफ़ बारूदी सुरंग है कविता

पलाश विश्‍वास


सवा बजे रात को आज मेरी नींद खुल गयी है। गोलू की भी नींद खुली देख, उसकी पीसी आन करवा ली और फिर अपनी रामकहानी चालू। जो मित्र अमित्र राहत की सांसें ले रहे थे, नींद में खलल पड़ने से बचने के ख्याल से बचने के लिए, उनकी मुसीबत फिर शुरू होने वाली है अगर मैं सही सलामत कोलकाता पहुंच गया तो, यानि आज से फिर आनलाइन हूं।



कल सुबह आठ बजे निकला था और नोएडा सेक्टर बारह, इंदिरापुरम, कला विहार मयूरविहार होकर प्रगति विहार हास्टल रात के नौ बजे करीब लौटा। आनंद स्वरूप वर्मा के वहां गहन विचार-विमर्श, वीरेनदा से गहराई तक मुलाकात और पंकज बिष्ट के साथ उनके घर में बिताये कुछ अनमोल अंतरंग क्षणों के साथ दिल्ली की यह यात्रा इस बार बहुत अनोखी बन निकली है और थकान से चूर-चूर होकर दस बजे ही घोड़े बेचकर सो गया था लेकिन दिमाग के सेल दुरुस्त होते ही आंखें फिर उनींदी हैं। पता नहीं कि ऐसी रात फिर कभी नसीब होगी या नहीं।

दिल्ली में अब भी एक बेचैन कवि आत्मा जिंदगी जीने का हुनर सिखा रही हैं हमें। उन्हीं के साथ आज की सी कोई पूस की रात को नैनी झील के किनारे हम लोगों ने कड़कड़ाती सर्दी में आखिरी बार उधम मचाया था और उस कवि ने कहा था कि पलाश, तुम सिर्फ गद्य लिख सकते हो, कविता हरगिज नहीं लिख सकते और तब मैंने कहा था कि दा, जरूर लिख सकता हूं। उस रात हमारे साथ एक और कवि थे पहाड़ और तराई में दीवानगी की हद तक काव्यधारा में बहनेवाले, हमारे वजूद का हिस्सा जो अब भी बने हुए हैं- हमारे गिरदा। साथ थे राजीव लोचन साह जैसे नख से शिख तक भद्रपुरुष और वैकल्पिक मीडिया की लड़ाई शुरू करने वाले हमारे सुप्रीम सिपहसालार आनंद स्वरूप वर्मा भी। शमशेर सिंह बिष्ट भी शायद आधी रात बाद बीच झील की तन्हा नैनीताल की उस रात के गवाह रहे हैं। शायद शेखर पाठक भी थे और हरुआ दाढ़ी भी। ठीक से याद नहीं है।

जाहिर है कि वह रात अब कभी नहीं लौटेगी, गिरदा के बिना वह रात लौटेगी नहीं।आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा भी कि गिरदा के बिना नैनीताल सूना अलूना है और अब वहां जाना सुहाता नहीं है। पहाड़ों में गिरदा का न होना हमारे यकीन के दायरे से बाहर है।

आज की इस रात की सुबह तो यकीनन होगी ही और सुबह की न सही, शाम की गाड़ी से उस कोलकाता जरूर पहुंचकर फिर धूनी रमानी है जहां इन्हीं कवि आत्मीय अग्रज ने मुझे सन 1991 को जबरन भेज दिया था कि कोलकाता को बदले बिना दुनिया नहीं बदलेगी और तब से मैं कोलकाता को बदलने में लगा हूं। क्योंकि कवि हूं नहीं मैं, फिर भी एक अतिप्रिय कविमित्र बड़े भाई के जुनूनी यकीन को सच में बदलने का जिम्मा मुझपर है कि दुनिया के गोलाकार वजूद की पूंछ वहीं से पकड़कर उस ऐसी पटखनी दूं कि सारी कविताएं सच हो जायें एकमुश्त।

इंदिरापुरम में जयपुरिया सनराइज शायद उस बहुमंजिली इमारत का नाम है, जिसमें हमारे समय के सबसे शानदार, सबसे जानदार कवि का बसेरा है इस वक्त। आठवीं मंजिल में। जहां आनंदजी के वहां से हम लेट पहुंचे और वीरेनदा इंतजार में थके भी नहीं। परिवार में सिर्फ रीता भाभी से मुलाकात हो पायी। वे जस की तस हैं साबुत। लेकिन बच्चों से इस दफा मुलाकात हुई नहीं है। अबकी बार वीरेनदा से मिलकर लगा कि कविता दरअसल लिखने की कोई चीज होती नहीं है। कविता जीने की चीज होती है और कवि जब तक कविता में जीता है, तब तक जिंदगी बची होती है और तभी तक बनती बिगड़ती रहती है दुनिया।

कविता के बिना न सभ्यता होती है और न मनुष्यता।

यह सिरे से संवेदनाओं का ही नहीं,सरोकार का मामला है। संवेदनाओं और सरोकार में जीने वाली कविता की मौत होती नहीं है, उसी तरह जैसे दुनिया को बदलने वाली जब्जे की मौत होती नहीं है। और बदलाव की फल्गुधारा कविता की ही तरह हमारी रगों में बहती रहती है। और हजारों रक्तनदियों की धार उसकी दिशा नहीं बदल सकती है। न उसकी मंजिल कभी बदल सकती है भले भटक जाये या बदल जाये हमारे दिलोदिमाग, हमारे सरोकार लखटकिया करोड़पतिया कारोबार में।

सोलह मई के बाद की कविता के अन्यतम आयोजक रंजीतजी, अपने युवा भविष्य अभिषेक और अमलेंदु दोनों आज दिन भर हमारे साथ रहे जो आनंदस्वरुप वर्मा, वीरेनदा और हमारे सान्निध्य में अब तक हमारा किया धरा को जारी रखने वाले सबसे काबिल लोग हैं। अभिषेक, अमलेंदु, रियाज, सुबीर गोस्वामी, पद्दो लोचन, एक्‍सकैलिबर, शरदिंदु और आने वाली पीढ़ियों के सहारे और उन तमाम युवा दिलोदिमाग जो आज की युवा स्त्रियों के खाते में भी हैं, हम छोड़ जायेंगे एक बेहतर दुनिया, साबुत सकुशल पृथ्वी, इसी तमन्ना में अटकी है हमारी जान जहां।

युगमंच का सिलसिला अभी जारी है। नैनीताल समाचार निकल रहा है। समकालीन तीसरी दुनिया को बेहतर बनाने की तैयारी है और राजतंत्र फिर वापस नहीं लौटेगा और न फासीवाद मनुष्यता और सभ्यता का नाश कर सकता है। पंकज दा हमें मयूर बिहार एक्सटेंशन तक पैदल छोड़कर फिर समयांतर के ताजा अंक को तराशने में लगे हैं। इससे बेहतर तस्वीरें हमारे लिए दूसरी हैं ही नहीं और न हो सकती हैं।

जैसे कि कविताएं सोलह मई के बाद अब भी लिखी जा रही हैं, चाहे गंगा के घाट बदले हों, पहाड़ में लालटेन जलती न हो और न कोई पौधा बंदूूक बन पाया हो और न कविता ने शहरों की घेराबंदी की हो। ये तस्वीरें बदलाव के यकीन को मजबूत बनाती हैं। अब हमको पूरा यकीन है कि हम रहे न रहें, बची रहेगी जिंदगी फिर भी और हमेशा की तरह बदलती रहेगी यह हमारी पृथ्वी भी। जिसे गोलक बनाकर खेल रहे हैं दुनियाभर के आदमखोर लोग।

इस उपमहादेश में सर्वत्र आतंक के खिलाफ, अमेरिका के युद्ध के खिलाफ कोई शहबाग आंदोलन भी है और यादवपुर के छात्र अब भी सड़कों पर हैं और बाकी छात्र युवा भी कभी भी सड़कों पर उतर सकते हैं। जैसे फिर कभी न कभी सड़कों पर उतर सकता है समूचा मेहनतकश तबका इस अबाध पूंजी के मुक्तबाजार के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध में। कविता में आस्था यही सिद्ध करती है।

कविता धर्मांध राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति तो हरगिज नहीं हो सकती। हर कविता की शक्ल वाल्तेअर जरूर है जिस के लिए मौत की सजा तय है।

हमारे लिए कोई कवि महान नहीं होता। हमारे लिए कोई कवि अच्छा या बुरा नहीं होता। नाम देखकर दाम तय करते हैं सौदागर मानुख और हम यकीनन सौदागर जमात के नहीं हैं।

जिनके लिए कविता सौंदर्यबोध और व्याकरण नहीं है, न निहायत ध्वनियों का सिनेमाघर है, न भाषायी करतबी चमत्कार है, न जादुई यथार्थ है, न बंधी बंधायी कोई कैद गंगा है पवित्रतम सड़ांध। बल्कि जिनके लिए एक मुकम्मल जिंदगी है और दुनिया को उसकी धुरी पर चलते देने का गुरिल्ला युद्ध है निरंतर। हम हर कविता में जनता का मोर्चा खोजते हैं। हम हर कविता में जनसुनवाई खोजते हैं। हम हर कविता में मुक्त बयार, उत्तुंग शिखर, अनबंधी नदियां और खिलते हुए बारूद की देह में माटी की खुशबू के साथ एक मुकम्मल गुरिल्ला युद्ध प्रकृति, पर्यावरण, मनुष्यता और सभ्यता के हक में चाहते हैं।

हम हर पल सोलह मई के बाद की कविता में वह कविता खोज रहे हैं जिसे हमारे तमाम प्रिय कवि रचते रहे हैं और जिसे पाश, नवारुण, गिरदा, सुकांत, चेराबंडुराजू और गोरख आखिरी सांस तक जीते रहे हैं और जिसे जीते हुए सबसे ज्यादा जिंदा हैं अब भी हमारे वीरेनदा। हमारे हिसाब से कवि होंगे बहुत सारे श्रेष्ठ, शास्त्रीय और कालातीत महान, लेकिन जिंदगी में कविता जीने वाले कवि कोई कोई होते हैंं और खुशकिस्मत हैं हम कि वे सारे कवि हमारे ही वजूद में शामिल हैं।

वीरेनदा से मिलकर इस रात के बीतने के बेचैन इंतजार को जी रहा हूं। फिलहाल और कहने की जरूरत नहीं कि इस बार दिल्ली आना बेहद अच्छा लग रहा है।

वीरेनदा से मिलकर फिर यह यकीन पुख्ता हुआ नये सिरे से कि कविता में ही रची बसी होती है मुकम्मल जिंदगी जो दुनिया को खत्म करने वालों के खिलाफ बारूदी सुरंग भी है।

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