11/20/2014

मोदी की निगाह में भारत

पंकज मिश्रा 

वी एस नायपॉल ने 1976 में भारत को 'एक घायल सभ्‍यता' का नाम दिया था जिसकी जाहिर राजनीतिक व आर्थिक नाकामियों की तह में एक गहरा बौद्धिक संकट पैबस्‍त था। इसके साक्ष्‍य के तौर पर उन्‍होंने कुछ विचित्र लक्षणों की ओर इशारा किया था जो 1962 में अपने पूर्वजों के इस देश की पहली यात्रा से लेकर बाद तक ऊंची जाति के मध्‍यवर्गीय हिंदुओं में उन्‍होंने पाए। भारतीयों का यह सम्‍पन्‍न तबका 'विदेशी' उपभोक्‍ता सामग्री और पश्चिम की स्‍वीकृति को लेकर सनक से उतना ही ज्‍यादा भरा हुआ था जितना कि उसे हर बात में 'विदेशी हाथ' का खुद का गढ़ा एक भय सताता था। नायपॉल ने इसी संदर्भ में निष्‍कर्ष देते हुए कहा था, 'भारतीयों को बिना विदेशी संदर्भ के अपने यथार्थ का पता ही नहीं लगता है।'

11/06/2014

फॉरवर्ड प्रेस प्रकरण- आखिरी किस्‍त

हक़ीकत के आईने में फ़सानों का कारोबार 




पिछले साल दलित लेखक मुसाफिर बैठा ने फॉरवर्ड प्रेस पर यह आरोप लगाया था कि फॉरवर्ड प्रेस, फॉरवर्ड प्रेस नहीं है बल्कि वह ‘कुशवाहा प्रेस’ है या ‘कुशवाहा दर्पण’ है। मुसाफिर ने इसके पीछे जो तर्क दिया था वह यह था कि फॉरवर्ड प्रेस में छपने वाले अधिकांश लेखक (दो-तिहाई) एक ही जाति यानी कुशवाहा जाति के होते हैं। 

11/05/2014

फॉरवर्ड प्रेस प्रकरण - तीसरी किस्‍त

हक़ीकत के आईने में फ़सानों का कारोबार 



फॉरवर्ड प्रेस में नौकरी करते हुए ऐसे अनेक अवसर आए जब मैंने लिखने की कोशिश की और मुझे लिखने से वहां सीधे-सीधे या परोक्ष रूप से मना कर दिया जाता रहा। लगभग 2 साल की नौकरी के दरमियान वहां जो मैंने 3-4 लेख लिखे भी उन्‍हें जबरदस्‍ती लिखवाया गया ताकि मैनेजमेंट का व्‍यक्तिगत हित सध सके। जिन अवसरों पर मुझको लिखने से वहां मना किया गया उनमें से कुछ प्रमुख घटनाओं का उल्‍लेख करना मैं यहां जरूरी समझता हूं।


11/03/2014

फॉरवर्ड प्रेस प्रकरण - दूसरी किस्‍त

हक़ीकत के आईने में फ़सानों का कारोबार 




फॉरवर्ड प्रेस में कर्मचारियों का शोषण होना और उन्‍हें बात-बात में अपमानित कर देना कोई नई बात नहीं है। पत्रिका का शायद ही कोई ऐसा कर्मचारी हो जिसने स्‍वेच्‍छा से संस्‍थान को छोड़ा हो। सब को एक तय समय पर टर्मिनेट कर दिया जाता है। बगैर किसी गलती के। दो-तीन महीने पहले सर्कुलेशन डिपार्टमेंट से एक नौजवान दलित कर्मचारी को उसके बेहतरीन परफार्मेंस के बावजूद टर्मिनेट कर दिया गया। उसे दूसरी जगह नौकरी पाने के लिए एक्‍सपीरिएंस सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ी और उसने फॉरवर्ड प्रेस के मालिकान से जब इसकी मांग की तो उसे जवाब मिला कि अगर तुम एक्‍सपीरिएंस सर्टिफिकेट की मांग करोगे तो तुम्‍हारे कैरेक्‍टर वाले कॉलम में ‘बैड’ लिख दिया जाएगा। और इस तरह से उस नौजवान दलित कर्मचारी ने एक्‍सपीरिएंस सर्टिफिकेट की मांग करनी बंद कर दी। यहां यह गौरतलब है कि फॉरवर्ड प्रेस में काम करने वाले किसी भी कर्मचारी को एप्‍वाइंटमेंट लेटर तक नहीं दिया जाता। यहीं एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि आखिर ऐसा क्‍यों किया जाता है?

11/02/2014

हक़ीकत के आईने में फसानों का कारोबार: संदर्भ फॉरवर्ड प्रेस

दिल्‍ली से निकलने वाली पत्रिका फॉरवर्ड प्रेस पर पिछले दिनों हुई पुलिस की कार्रवाई, कार्रवाई के पीछे पत्रिका के प्रबंधन द्वारा महिषासुर-विमर्श से जुड़े कंटेंट का दावा किया जाना और उस संदर्भ में शुरू हुई तमाम बहसों का सिलसिला कम से कम सोशल मीडिया पर अब भी थमा नहीं है। सबके अपने-अपने पक्ष के बीच पत्रिका के संपादकीय कर्मी रहे कवि पंकज चौधरी द्वारा काफी बाद में किए गए उद्घाटनों ने पत्रिका के प्रबंधन और उसकी कार्यशैली के संदर्भ में गंभीर सवाल उठाए तो उसकी प्रत्‍यक्ष संपादकीय लाइन या कहें राजनीति को भी कठघरे में खड़ा किया। टुकड़ों में सोशल मीडिया पर जारी किए गए पोस्‍ट को विस्‍तार से एक मुकम्‍मल शक्‍ल देकर पंकज चौधरी ने हमें भेजा है, जिसे हम किस्‍तों में अविकल प्रकाशित कर रहे हैं। इन श्रृंखला पर सुविचारित प्रतिक्रियाएं  आमंत्रित हैं। (-मॉडरेटर) 





फॉरवर्ड प्रेस को दलित-बहुजन की पत्रिका माना जाता है। खासकर के ओबीसी की। ओबीसी के उन तत्‍वों को यह पत्रिका प्रचारित-प्रसारित करने का दावा करती रही है जो प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और सामाजिक न्‍याय के मूल्‍यों में अटूट आस्‍था रखते हैं। लेकिन पिछले एक डेढ़ साल के अंकों को उलट-पुलटकर यदि देखा जाए तो आपको ये सारे मूल्‍य वहां धराशायी होते हुए नजर आएंगे।

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