12/30/2015

2015 से आगे की एक कविता


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


12/21/2015

शिंज़ो आबे, मोदी और एशिया की बदलती राजनीति



कुमार सुंदरम 


दिसंबर में जापानी परधानमंत्री जैसे नरेंद्र मोदी के लिए सांता क्लॉज़ बन के आए थे. बुलेट ट्रेन, लड़ाकू नौसेनिक विमान, औद्योगिक गलियारे के लिए निवेश और भारत-जापान परमाणु समझौता. भारतीय मीडिया को ज़्यादा तरजीह देने लायक मामले बुलेट ट्रेन और बनारस में शिंजो आबे की गंगा आरती ही लगे, लेकिन इसी बीच परमाणु समझौते को भी मुकम्मल घोषित कर दिया गया. हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञान व अंतर्राष्ट्रीय मामलों के प्रभारी पत्रकार परमीत पाल चौधरी ने अपने सरकारी स्रोतों के हवाले से इस परमाणु डील को फाइनल करार दे दिया और यह भी खबर दी कि अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस अब रास्ता साफ़ होने के बाद 1000 मेगावाट क्षमता के 6 परमाणु बिजली कारखाने बेचने का मसौदा लेकर तैयार है.

12/20/2015

छत्‍तीसगढ़ में कैद बेगुनाह पत्रकारों के समर्थन में उतरे प्रतिष्ठित लेखक, बुद्धिजीवी और संगठन





नई दिल्‍ली, 20 दिसंबर : छत्‍तीसगढ़ की जेल में फर्जी मुकदों में बंद दो पत्रकारों संतोष यदव व सोमारू नाग की तत्‍काल रिहाई समेत कई अन्‍य मांगों को उठाने के लिए कल यानी 21 दिसंबर, 2015 को जगदलपुर में होने जा रहे पत्रकार महाआंदोलन को प्रतिष्ठित लेखकों, पत्रकारों, राजनीतिक व सामाजिक संगठनों ने अपना समर्थन दिया है।

12/10/2015

यादों के सहारे : मैं विद्रोही बोल रहा हूं!




महताब आलम 



आगे विद्रोही और पीछे महताब आलम 

दिल्ली के किसी नए लैंडलाइन/मोबाइल नंबर से मेरे मोबाइल पर घंटी बजती है तो दिल से निकलता है, लो आ गया फिर किसी लोन देने वाले/फ्लैट दिलाने वाले/गाड़ी बेचने वाले/बीमा एजेंसी वाले का फोन! मन होता है कि न उठाऊँ, और कई बार नहीं भी उठाता हूं, लेकिन फिर ये भी खयाल होता है क्या पता किसी परिचित का फोन हो। बैलेंस 'नहीं' होगा इसलिए ऑफिस के फोन से कर रहे हों या फिर किसी साथी के फोन से। और ऐसा हुआ भी है, कई बार। सो उठा लेता हूं अननेम्ड कॉल्स भी। क्या पता कोई ज़रूरी कॉल छूट जाये इन कमबख्तों के चक्कर में। ऐसे नम्बरों से आने वाले कॉल्स में इन कस्टमर केयर और कॉल सेंटर से आने वाले कॉल्स के बाद सबसे ज़यादह आता है एक अहम कॉलफोन उठाते ही एक चिर-परिचित आवाज़ उभरती है: "हेलो कामरेड महताब...!" मैं समझ जाता हूं, ये विद्रोहीजी बोल रहे हैं- उनके बोलने से पहले कि "मैं विद्रोही बोल रहा हूं"!


12/08/2015

भारत, जापान और परमाणु ऊर्जा का सच



कुमार सुंदरम 


जैतापुर या कूडनकुलम का आंदोलन हो या भारत-जापान परमाणु समझौते के खिलाफ इस हफ्ते होने वाला देशव्यापी आंदोलन, इन सभी मौकों पर देश के शहरी मध्यवर्ग और उसके साथ-साथ मीडिया से लेकर अदालतों तक सबका रुख यही रहता है कि विस्थापन, पर्यावरण और सुरक्षा के सवाल तो अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन भारत को बिजली तो चाहिए।विकास तो चाहिए। देश के लिए विकास, विकास के लिए बेतहाशा बिजली और बिजली के लिए अणु-बिजलीघर, इन तीनों कनेक्शनों को बिना किसी बहस के सिद्ध मान लिया गया है और आप इस तर्क की किसी भी गाँठ को दूसरी सूचनाओं-परिप्रेक्ष्यों से खोलने की कोशिश करते हैं तो राष्ट्रद्रोही करार दे दिए जाते हैं.

12/07/2015

आखिर क्यों हो रहा है देश भर में भारत-जापान परमाणु समझौते का विरोध?



कुमार सुंदरम 

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे अगले हफ्ते तीन दिनों की यात्रा पर भारत आएँगे। इस दौरान उनके बनारस दौरे के तामझाम के अलावा जो मुख्य बात होनी है वह है भारत और जापान के बीच परमाणु समझौता। यह परमाणु करार पिछले कई सालों से विचाराधीन है और इसे लेकर भारत और जापान दोनों देशों में विरोध होता रहा है. इस बार शायद मोदी और आबे दोनों इस समझौते के लिए आख़िरी ज़ोर लगाएं क्योंकि दोनों की राजनीतिक पूंजी अब ढलान पर है.

12/04/2015

भारत-जापान न्‍यूक्लियर डील के विरोध की अपील




भारत-जापान परमाणु समझौता उस बड़ी डील की आख़िरी बची हुई कड़ी है जिसके इर्द-गिर्द देश की राजनीति पिछले दस साल से घूम रही है. बाकी सारे समझौते संपन्न होने, किसानों से ज़बरदस्ती ज़मीन छीने जाने और आयातित अणु-बिजलीघरों के लिए पर्यावरण, सुरक्षा और पारदर्शिता के कायदे ताक पर रख दिए जाने और परमाणु दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे का भार विदेशी कंपनियों पर न डालने के निर्लज्ज वादों के बावजूद अमेरिका और फ्रांस के परमाणु प्रोजेक्ट अभी तक अटके पड़े हैं. उनके डिज़ाइनों में कुछ ऐसे पुर्ज़ों की ज़रुरत होती है जो सिर्फ जापान बनाता है. फुकुशिमा के बाद पूरी दुनिया में परमाणु लॉबी का कारोबार आख़िरी सांस ले रहा है और उनको भारत में अपना बाज़ार बढ़ाने के लिए जापान-भारत परमाणु समझौते की सख्त दरकार है. परमाणु-विरोधी आन्दोलनों और जैतापुर, मीठीविर्दी, कोवाडा तथा कूडनकुलम के किसानों  यह आख़िरी मौक़ा है अपना विनाश रोकने का.

11/10/2015

हमारे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों साल पहले खोज लिया था सारी समस्‍याओं का समाधान : कैलाश सत्‍यार्थी

शांति के लिए नोबल पुरस्‍कार मिलने के बाद कैलाश सत्‍यार्थी की सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया बेहद कम देखने में आई है। इधर बीच उन्‍होंने हालांकि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्‍य को एक लंबा साक्षात्‍कार दिया है जो 9 नवंबर को वहां प्रकाशित हुआ है। उससे दो दिन पहले बंगलुरु प्रेस क्‍लब में उन्‍होंने समाचार एजेंसी पीटीआइ से बातचीत में कहा था कि देश में फैली असहिष्‍णुता से निपटने का एक तरीका यह है कि यहां की शिक्षा प्रणाली का ''भारतीयकरण'' कर दिया जाए। उन्‍होंने भगवत गीता को स्‍कूलों में पढ़ाए जाने की भी हिमायत की, जिसकी मांग पहले केंद्रीय मंत्री सुषमा स्‍वराज भी उठा चुकी हैं। शिक्षा के आसन्‍न भगवाकरण और देश में फैले साम्‍प्रदायिक माहौल के बीच नोबल पुरस्‍कार विजेता सत्‍यार्थी के पांचजन्‍य में छपे इस अहम साक्षात्‍कार के कुछ अंश हम यहां साभार पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं। -मॉडरेटर 



कैलाश सत्‍यार्थी 

10/24/2015

मेरे लेखकों! किसका इंतज़ार है और कब तक?

पाणिनि आनंद 
करीब सात हफ्ते पहले हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक उदय प्रकाश ने जब अपना साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया था तब उनसे सबसे पहला विस्‍तृत साक्षात्‍कार कैच न्‍यूज़ के वरिष्‍ठ सहायक संपादक पाणिनि आनंद ने  लिया था। यह साक्षात्‍कार 6 सितंबर को प्रकाशित हुआ था लेकिन कई तथ्‍य इसमें संपादित कर दिए गए थे। उस वक्‍त तक न तो यह अंदाज़ा था कि पुरस्‍कार वापसी की यह इकलौती कार्रवाई एक चिंगारी का काम करेगी, न ही यह इलहाम था कि साहित्‍य अकादमी को अपने कदम पीछे खींचने पड़ेंगे और लेखकों की हत्‍याओं की औपचारिक निंदा करने को मजबूर होना पड़ेगा। आज जब करीब चार दर्जन लेखकों की पुरस्‍कार वापसी के बाद सरकार की इस ''स्‍वायत्‍त'' संस्‍था को झुकना पड़ा है और आंदोलन अपने पहले चरण को तकरीबन पूरा कर चुका है, तो लेखकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब आगे क्‍या होगा? सरकार विचलित है तो लेखक भी चिंतित हैं। इस समूचे अध्‍याय पर पाणिनि आनंद ने इस बार ख़बर से आगे बढ़कर एक प्रेरणादायी और आवाहनकारी लेख लिख डाला है जो उदय प्रकाश के साक्षात्‍कार के छूट गए अंशों को मिलाकर काफी तथ्‍यात्‍मक और प्रेरणादायी बन पड़ा है। यह लेख बीते डेढ़ महीनों में घटी घटनाओं पर प्रकाश डालते हुए भविष्‍य की भी पड़ताल करता है। (मॉडरेटर)  



ग्राफिक्‍स: साभार कैच न्‍यूज़ 



10/23/2015

हरीश रावत के जिंदल प्रेम में एक्‍सपोज़ हुई भाजपा, पीसी तिवारी व अन्‍य हिरासत में


पुष्‍कर सिंह बिष्‍ट । अल्मोड़ा


रानीखेत के नैनीसार में जिंदल समूह को कौड़ियों के भाव ग्रामीणों की जमीन देने के विरोध में आए उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के पीसी तिवारी व उनके आठ सहयोगियों सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणों खासकर महिलाओं को पुलिस दमन का शिकार होना पड़ा। इलाके को पुलिस छावनी बनाकर मुख्यमंत्री ने इस कथित अंतरराष्‍ट्रीय स्कूल का उद्घाटन आखिरकार कर ही डाला। गुरुवार की सुबह जब परिवर्तन पार्टी के सदस्‍यों का दल कार्यक्रम स्थल की ओर रवाना हुआ तो कटारमल के पास पुलिस ने पीसी तिवारी, जीवन चंद्र, प्रेम आर्या, अनूप तिवारी, राजू गिरी आदि को हिरासत में ले लिया। देर शाम तक इन लोगों को नहीं छोड़ा गया था। 


9/29/2015

वीरेन डंगवाल के संग एकालाप


मृत्‍युंजय 


मेरे भीतर एक डोमाजी उस्ताद बैठे हैं

9/28/2015

वीरेनदा का जाना और एक अमानवीय कविता की मुक्ति


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


वीरेन डंगवाल (05.08.1947 - 28.09.2015)
(तस्‍वीर: विश्‍व पुस्‍तक मेला, 2015)

वीरेन डंगवाल यानी हमारी पीढी में सबके लिए वीरेनदा नहीं रहे। आज सुबह वे बरेली में गुज़र गए। शाम तक वहीं अंत्‍येष्टि हो जाएगी। हम उसमें नहीं होंगे। अभी हाल में उनके ऊपर जन संस्‍कृति मंच ने दिल्‍ली के गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में एक कार्यक्रम करवाया था। उनकी आखिरी शक्‍ल और उनसे आखिरी मुलाकात उसी दिन की याद है। उस दिन वे बहुत थके हुए लग रहे थे। मिलते ही गाल पर थपकी देते हुए बोले, ''यार, जल्‍दी करना, प्रोग्राम छोटा रखना।'' ज़ाहिर है, यह तो आयोजकों के अख्तियार में था। कार्यक्रम लंबा चला। उस दिन वीरेनदा को देखकर कुछ संशय हुआ था। थोड़ा डर भी लगा था। बाद में डॉ. ए.के. अरुण ने बताया कि जब वे आशुतोष कुमार के साथ वीरेनदा को देखने उनके घर गए, तो आशुतोष भी उनका घाव देखकर डर गए थे। दूसरों से कोई कुछ कहता रहा हो या नहीं, लेकिन वीरेनदा को लेकर बीते दो साल से डर सबके मन के भीतर था। 


9/16/2015

हिंदुत्ववादियों के विलाप के बावजूद नेपाल फिर ‘हिंदू राष्ट्र’ नहीं बन सका


आनंद स्‍वरूप वर्मा 


आखिरकार नेपाल के बहुप्रतीक्षित संविधान को अंतिम रूप देने का काम 13 सितंबर से शुरू हो गया। 2008 में निर्वाचित पहली संविधान सभा को ही यह कार्य संपन्न करना था लेकिन संभव नहीं हो सका। फिर 2013 में दूसरे संविधान सभा का चुनाव हुआ और इस बार भी ऐसा लग रहा था कि संविधान नहीं बन सकेगा। अब उम्मीद की जा रही है कि 20 सितंबर 2015 तक नेपाल के नए संविधान की घोषणा हो जाएगी। अब तक की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि तमाम दबावों के बावजूद नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र का दर्जा नहीं दिया गया और संविधान में धर्म निरपेक्षशब्द को जस का तस रहने दिया गया। हिंदुत्ववादी विलाप करते रहे।


9/14/2015

यह मुकदमा कुछ सवाल करता है


हरे राम मिश्र 



अभी हाल ही में यह पता चला है कि हाशिमपुरा जनसंहार में इंसाफ की मांग कर रहे कवियों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत रिहाई मंचके नेताओं पर दंगा भड़काने जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। मुकदमे में आरोपित लोग हाशिमपुरा जनसंहार में विवेचना अधिकारी द्वारा लचर और पक्षपात पूर्ण विवेचना करने और सरकार द्वारा बेगुनाह नागरिकों के हत्यारे पुलिस वालों को आपराधिक तरीके से बचाने के खिलाफ अपना लोकतांत्रिक विरोध विरोध व्यक्त करते हुए पूरे मामले की उच्चतम न्यायालय की देख-रेख में पुनः न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे।

9/09/2015

प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या और पुरस्‍कार वापसी पर जन संस्‍कृति मंच का वक्‍तव्‍य

प्रो. कलबुर्गी की ह्त्या का प्रतिवाद और श्री उदय प्रकाश और प्रो. चंद्रशेखर पाटिल द्वारा सम्मान लौटाए जाने की घोषणा का महत्व 





मुलायम समाजवाद में लेखक, कवि, पत्रकार, कलाकार सब दंगाई हैं!


वरिष्‍ठ कवि अजय सिंह, प्रो. रमेश दीक्षित, पत्रकार कौशल किशोर, सत्‍यम वर्मा, रामकृष्‍ण समेत 16 लोगों पर दंगा भड़काने की कोशिश के आरोप में एफआइआर, भगवा दंगाइयों के खिलाफ शिकायत पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं 


सम्‍मेलन को संबोधित करते प्रो. रमेश दीक्ष्ति 

9/05/2015

उदय प्रकाश के बारे में विष्‍णु खरे का ताज़ा पत्र

(हिंदी के लेखक उदय प्रकाश के साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार लौटाने पर थोड़ी ही देर पहले हिंदी के कवि विष्‍णु खरे का यह पत्र ई-मेल से प्राप्‍त हुआ है और इसे छापने का आग्रह किया गया है। नीचें पढ़ें विष्‍णु खरे जी की पूरी पाती - मॉडरेटर) 


विष्‍णु खरे 

9/04/2015

प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या के विरोध में उदय प्रकाश ने साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया


(हिंदी के नामचीन लेखक उदय प्रकाश ने हिंदुत्‍ववादी ताकतों द्वारा कन्‍नड़ के विद्वान प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या के विरोध में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाने की घोषणा की है। उन्‍होंने शुक्रवार की सुबह अपने फेसबुक वॉल पर इस संबंध में निम्‍न पोस्‍ट लिखा है)




8/31/2015

बनारस में हो तो अपना लक पहन के चलो!



अभिषेक श्रीवास्‍तव 


बनारस के अख़बारों में मरने-मारने की ख़बरें हाल तक काफी कम होती थीं। एक समय था जब कुछ लोग ऐसा दावा भी करते थे कि बनारस में बलात्‍कार नहीं होते और लोग खुदकुशी नहीं करते। मारपीट और गुंडई की बात अलग है लेकिन लोगों के बीच दैनिक जीवन में असहिष्‍णुता तो नहीं ही होती थी। आज बनारस के अखबार उठाकर देखिए। दो बातें दिखाई देंगी। पहला, स्‍थानीय संस्‍करणों के शुरुआती तीन-चार पन्‍ने रियल एस्‍टेट के विज्ञापनों से पटे पड़े हैं। दूसरा, भीतर के पन्‍नोंं पर हत्‍या, पीट कर मार डालने, खुदकुशी, फांसी लगाने जैसी खबरें बहुतायत में हैं। परसों कोई जाम में फंस कर मर गया। एक लड़की ने मायके में फांसी लगा ली। एक इंजीनियर ने बेटी का गला घोंट दिया और खुद  को मार लिया। एक छेड़छाड़ के आरोपी युवक को लोगों ने पीट-पीट कर मार दिया। यह बदलते हुए बनारस का एक नया चेहरा है। 

गड्ढे से निकलने को बेचैन है बनारस 

8/30/2015

बनारस सुरक्षा बंधन मना रहा है!


अभिषेक श्रीवास्‍तव 



पूर्णिमा बीत गई। सावन ढलने वाला है। देश रक्षाबंधन मना चुका। बनारस सुरक्षा बंधन मना रहा है। देखकर दिमाग चकरा गया जब हमने शुक्रवार की सुबह करीब दो दर्जन औरतों की भीड़ को नई सड़क के एक कोने में एक स्‍टॉल के पास जमा पाया। स्‍टॉल पर भाजपा का गमछा लपेटे एक दबंग टाइप अधेड़ शख्‍स फेरीवाले की तरह आवाज़ लगा रहा था, ''आज आखिरी दिन है।'' वह वहां खड़ी औरतों को प्रधानमंत्री बीमा योजना का फॉर्म बांट रहा था। मेज़ पर ढेर सारे आधार कार्ड पड़े थे, कुछ औरतें फॉर्म भरने में व्‍यस्‍त थीं तो कुछ उसे लेकर घर जा रही थीं। मैंने फॉर्म मांगा तो वहां बैठे व्‍यक्ति ने मना कर दिया और कुछ संदेह से मुझे देखने लगा। आसपास के स्‍थानीय पुरुष बेशक इस सुरक्षा का असल मतलब समझ रहे हों, लेकिन उन्‍हें पान चबाने और गाली देने से फुरसत नहीं है कि वे ऐसे मामलों में- हमारी भाषा में- इन्‍टरवीन कर सकें। 


8/28/2015

काशी में बैठकर झूठ कौन बोलता है!




बनारस और दिल्‍ली के बीच कई संयोग हैं। पहले भी थे, अब भी हैं, आगे भी घटते रहेंगे। कुछ संयोग हालांकि ऐसे होते हैं जिनकी ओर हमारा ध्‍यान सहज नहीं जाता। मसलन, कल शाम जब बनारस के अपने अख़बार गांडीव पर नज़र पड़ी तो मेरा दिमाग कौंधा। दिल्‍ली में राजेंद्र यादव के जाने के बाद रचना यादव हंस चला रही हैं। इधर, बनारस में राजीव अरोड़ा के जाने के बाद रचना अरोड़ा गांडीव निकाल रही हैं। मैंने पहली बार उनका संपादकीय कल देखा, ''...और थम गई काशी''। ज़ाहिर है, जाम की जो ख़बर ए पार से ओ पार तक दावानल की तरह फैली हुई थी, वह गांडीव से कैसे छूट जाती। तो इस ऐतिहासिक जाम का विवरण देने के बाद रचना अरोड़ा संपादकीय के अंत में जब 'हर हर महादेव' लिखा, तो एक बात समझ में आई कि मामला कुल मिलाकर अंत में महादेव के भरोसे ही जा टिकना है, चाहे इस क्षेत्र का सांसद, विधायक, प्रतिनिधि कोई भी हो। 

8/27/2015

क्‍योटो के ए पार, क्‍योटो के ओ पार...



अभिषेक श्रीवास्‍तव 


आज पानी गिर रहा है... 

हफ्ते भर बाद बनारस में कल बारिश हुई। बारिश होते ही दो खबरें काफी तेजी से फैलीं। पहली, कि नई सड़क पर कमर भर पानी लग गया है। दूसरी, कि पूरा शहर जाम है। खबर इतनी तेज फैली कि कचहरी पर तिपहिया ऑटो की कतारें लग गईं। कोई भी ऑटो शहर में जाने को तैयार नहीं था। हमेशा की तरह शहर दो हिस्‍सों में बंट गया था। कचहरी पर बस एक ही आवाज सुनाई दे रही थी- आइए, ए पार। ओ पार बोलने वाला कोई नहीं था। यह बनारस का पुराना मर्ज है।

8/26/2015

बनारस-क्‍योटो संधि का एक साल: किस्‍तों में ज़मीनी पड़ताल



अभिषेक श्रीवास्‍तव 





प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 अगस्‍त 2014 को जापान में एक सौदा किया था। सौदा था बनारस को क्‍योटो बनाने का, या कहें क्‍योटो जैसा बनाने का। एक बरस बीत रहा है और डा. मोदी के एक्‍स-रे से जितना बनारस बाहर हो चुका है, उतना ही जापान। फिलहाल उन्‍हें सिर्फ पाकिस्‍तान दिखाई दे रहा है। उनकी एक्‍स-रे मशीन साल भर में बिगड़  गई है। बनारस के लोग बेचैन हैं कि राडार इधर की ओर घूमे।

8/20/2015

हेम मिश्रा: चालीस मीटर के 'संपूर्ण संसार' में दो साल


अंजनी कुमार 


हेम मिश्रा : दो साल से नागपुर की अंडा सेल में कैद 

8/15/2015

निराशावाद छोडि़ए, फाफड़ा खाइए और शांत रहिए

(अखिलेश कुमार संघर्षरत होनहार युवा पत्रकार हैं। कल ही इनके मन में कुछ खयाल स्‍वतंत्रता दिवस को लेकर आए। रात बीती, तो सुबह लाल किले से भी कुछ खयाल छोड़े गए। इन दोनों खयालों को मिलाकर और थोड़ा संपादन व थोड़ा वक्‍त लगाकर इस गणतंत्र की आज़ादी की एक तस्‍वीर उभरी है- मॉडरेटर)   

अखिलेश कुमार 

8/02/2015

नेपाल का संविधान और 40 सूत्रीय मांग



विष्‍णु शर्मा 


4 फरवरी 1996 को तत्कालीन संयुक्त जनमोर्चा (नेपाल) की ओर से डाॅ बाबुराम भट्टराई ने प्रधान मंत्री शेर बहादुर देउबा को 40 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा। संयुक्त मोर्चा ने यह भी घोषणा की कि इन मांगों पर यदि सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया तो वे राज्यसत्ता के विरोध में सशक्त संघर्ष के रास्ते में जाने के लिए बाध्य होंगे14 फरवरी 1996 को नेपाल की कम्युनिस्‍ट पार्टी (माओवादी) ने नेपाल की राज्यसत्ता के विरुद्ध जनयुद्ध की घोषणा कर दी।


7/30/2015

एक आततायी भीड़ का शोकगान



नदीम असरार
@_sufiyana_ 

आज भारत के सामने नैतिक रूप से दो परस्‍पर विरोधाभासी घटनाएं घट रही हैं: पहली, 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी याकूब मेनन को उसके 54वें जन्‍मदिवस पर दी गई फांसी; और दूसरी, कुछ घंटों बाद मिसाइल मैन व पीपुल्‍स प्रेसिडेंट एपीजे अब्‍दुल कलाम की राजकीय सम्‍मान के साथ अंत्‍येष्टि, जो किसी भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता के मामले में की गई एक दुर्लभ व अभूतपूर्व खुशामद है।  

7/28/2015

नेपाल में गायः पवित्र जीव से राष्ट्रीय पशु तक


विष्‍णु शर्मा का यह लेख दो दिन पहले जब हमें प्राप्‍त हुआ, उस वक्‍त तक नेपाल के संविधान में ''धर्मनिरपेक्ष'' शब्‍द पर कोई बहस प्रत्‍यक्ष नहीं थी, लेकिन 28 जुलाई 2015 के अखबारों की मानें तो नेपाल के सभी राजनीतिक दलों के बीच यह सहमति बन चुकी है कि संविधान में से ''सेकुलर'' शब्‍द को हटाया जाएगा। इसी कारण से इस लेख में जहां कहीं धर्मनिरपेक्ष शब्‍द आया है, वहां उसके सामने एक संपादकीय टिप्‍पणी डाल दी गई है अथवा उसे डबल कोट्स में कर दिया गया है- मॉडरेटर  


7/27/2015

गौमांस पर प्रतिबंध और मौलिक अधिकारों का हनन - कुछ आयाम

पीपल्स यूनियन फॉर डैमोक्रैटिक राइट्स
रिपोर्ट प्रकाशन - जुलाई 2015
गौमांस पर प्रतिबंध और मौलिक अधिकारों का हनन - कुछ आयाम



7/14/2015

Banned and Damned: SIMI’s Saga with UAPA Tribunals



पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स

(रिपोर्ट प्रकाशन)
                                                                                                                        

8 जुलाई 2015





6/29/2015

इमरजेंसी का स्‍मरण और गांधी के बाएं बाजू बंधा बैनर



अभिषेक श्रीवास्‍तव



''आपातकाल की चालीसवीं बरसी पर रिहाई मंच ने दिया धरना... जलाकर मारे गए शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह को इंसाफ दिलाने और प्रदेश में दलितों, महिलाओं, आरटीआइ कार्यकर्ताओं व पत्रकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ शासन को सौंपा 17 सूत्रीय ज्ञापन।''



6/17/2015

शाहजहांपुर, जून और विश्‍वासघात: 157 बरस पहले का एक पन्‍ना


पहली जंग-ए-आज़ादी के महानायक डंका शाह की भुला दी गयी शहादत


शाह आलम 
शाह आलम इतिहास की कब्र को खोदकर आज़ादी के वीर सपूतों की रूहों को आज़ाद कराने के काम में बरसों से जुटे हैं। इस बार उन्‍होंने 1857 की पहली जंग-ए-आजा़दी के योद्धा सूफ़ी फ़कीर डंका शाह को खोज निकाला है जिनकी कब्र उत्‍तर प्रदेश के शाहजहांपुर में है। डंका शाह अपनों के ही विश्‍वासघात के कारण 15 जून 1858 को शहीद हुए थे। संयोग है कि 157 वर्षों बाद उसी शाहजहांपुर में जून के ही महीने में एक पत्रकार को काले अंग्रेज़ों ने जलाकर मार दिया। जगेंद्र सिंह की ख़ता बस इतनी थी कि उसने अपनी ज़बान एक सत्‍ताधारी के खिलाफ खोली थी। उसने अपनी जान को ख़तरा भी बताया था, लेकिन अपनी बिरादरी ने ही गद्दारी कर दी। बेशर्मी की इंतिहा देखिए कि पत्रकारों ने जगेंद्र को पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया। 1857 की जंग की नाकामी का सबक शाह आलम कुछ यूं गिनाते हैं, ''आप बिकेंगे तो हर मोर्चे पर हारेंगे।'' 2015 के शाहजहांपुर पर भी यह सबक हूबहू लागू होता है। फि़लहाल पढि़ए डंका शाह के शहादत दिवस 15 जून पर यह विशेष प्रस्‍तुति - (मॉडरेटर) 


6/14/2015

बीएचयू ब्रांड साम्‍प्रदायिक सौहार्द: स्‍वामी-खलकामी के बीच लटका जमात-ए-इस्‍लामी हिंद


 परसों मेल पर एक न्‍योता आया। भेजने वाले का नाम है तौसीफ़ मादिकेरी और परिचय है 'राष्‍ट्रीय सचिव', स्‍टू‍डेंट्स इस्‍लामिक ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ इंडिया (एसआइओ)। कार्यक्रम बनारस हिंदू युनिवर्सिटी में दो दिन का एक अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन (15-16 जून, 2015) है जिसका विषय है ''साम्‍प्रदायिक सौहार्द और राष्‍ट्र निर्माण'' पर अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन। आमंत्रण का कार्ड देखकर कुछ आशंका हुई क्‍योंकि उद्घाटन करने वाले व्‍यक्ति का नाम है राम शंकर कथेरिया, जो केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्‍यमंत्री है और समापन वक्‍तव्‍य देने वाले का नाम है इंद्रेश कुमार, जिसके परिचय में लिखा है ''सोशल एक्टिविस्‍ट, दिल्‍ली''। जिस मेल से न्‍योता आया था, मैंने उस पर एक जिज्ञासा लिखकर भेजी कि इंद्रेश कुमार नाम का यह 'सोशल एक्टिविस्‍ट' कौन है, कृपया इसकी जानकारी दें। जवाब अब तक नहीं आया है। इस दौरान कार्यक्रम के सह-संयोजक बीएचयू के राजनीतिशास्‍त्र विभाग के अध्‍यक्ष कौशल किशोर मिश्रा ने twocircles.net के पत्रकार सिद्धांत मोहन को फोन पर पुष्टि की है कि आमंत्रण कार्ड पर मौजूद इंद्रेश कुमार राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के प्रचारक ही हैं, और कोई नहीं। आमंत्रण भेजने वाले एसआइओ के राष्‍ट्रीय सचिव तौसीफ का कहना है कि ये बात गलत है और सिर्फ प्रचार के उद्देश्‍य से फैलायी जा रही है। तौसीफ कहते हैं, ''आप खुद आकर देखिए। ये इंद्रेश कुमार नीदरलैंड के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं जो दिल्‍ली में रहते हैं।'' पत्रकार महताब आलम ने इस दौरान अपनी फेसबुक पोस्‍ट में प्रो. के.के. मिश्रा के हवाले से पुष्टि की है कि कार्यक्रम में आरएसएस के इंद्रेश कुमार ही आ रहे हैं। 

5/13/2015

विकास की बलिवेदी पर: आखिरी किस्‍त

अर्धकुक्‍कुटीय न्‍याय की चौखट 

इस कहानी को और लंबा होना था। कनहर की कहानी के भीतर कई ऐसी परतें हैं जिन्‍हें खोला जाना था। ऐसा लगता है कि उसका वक्‍त अचानक खत्‍म हो गया। यह भी कह सकते हैं कि उसका वक्‍त अभी कायदे से आया नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बीते गुरुवार यानी 7 मई को राष्‍ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कनहर पर अपना वह बहुप्रतीक्षित फैसला सुना दिया जिसके बारे में सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव का 20 अप्रैल को दिया गया एक दिलचस्‍प बयान था, ''इन लोगों को पता था कि कनहर का फैसला इनके खिलाफ़ आने वाला है, इसीलिए ये लोग सब्र नहीं कर पाए और ऑर्डर रिजर्व होते ही ग्रामीणों को भड़का दिए।''

5/06/2015

विकास की बलिवेदी पर: तीसरी किस्‍त

अकलू को 1 मई को अस्‍पताल से छुट्टी मिल गयी 
14 अप्रैल की गोलीबारी में घायल अकलू को 1 मई को बीएचयू के अस्‍पताल से छोड़ा गया। उस दिन बताते हैं कि अस्‍पताल में एक सिपाही अकलू के पास कुछ पैसे लेकर आया था। एक वामपंथी छात्र संगठन के कुछ कार्यकर्ता जो अकलू की देखरेख में थे, उनका कहना है कि बांध की ठेकेदार एचईएस कंपनी ने बीस हज़ार रुपये अकलू को भिजवाये थे और हिदायत दी थी कि अस्‍पताल से निकलने के बाद वह दोबारा आंदोलन में नहीं जुड़ेगा। उसी दिन यह भी आशंका ज़ाहिर की गयी कि कहीं अस्‍पताल से निकलने के बाद अकलू को गिरफ्तार न कर लिया जाए। इस आशय का एक ईमेल एलर्ट अखिल भारतीय वन श्रमजीवी यूनियन की ओर से प्रसारित किया गया था जिसमें अकलू को गिरफ्तारी से बचाने के लिए डीएम, एसपी, मुख्‍य सचिव, गृह सचिव, राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग आदि को फोन करने की अपील की गयी थी। आखिरकार अकलू को गिरफ्तार नहीं किया गया। 

5/01/2015

विकास की बलिवेदी पर: पहली किस्‍त

आंबेडकर जयन्‍ती पर चली गोली से घायल अकलू चेरो, ग्राम सुन्‍दरी, सोनभद्र 


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