1/22/2015

खबर हटवाने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस ने TwoCircles.Net को जारी किया नोटिस

नई दिल्ली (प्रेस विज्ञप्ति): उत्तर प्रदेश पुलिस ने 2011 में प्रकाशित एक खबर को हटवाने के लिए द्विभाषीय खबरी वेबसाईट TwoCircles.Net(TCN) को कानूनी नोटिस भेजा है. 2011 में वेबसाईट पर छपी इस खबर में महाराष्ट्र पुलिस में महिला कॉन्स्टेबल प्रशिक्षुओं के प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाने का ज़िक्र है.
21 जनवरी 2015 को जारी इस नोटिस में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कहा है कि उन्हें किसी से शिक़ायत मिली कि कोई पुलिस विभाग के सम्मान के साथ खिलवाड़ कर रहा है और वेबसाईट पर विभाग के सन्दर्भ में तथ्यहीन, आधारहीन, झूठी और अपमानजनक खबर छापी गयी हैं.

1/19/2015

जलते हुए जलगांव के बीच विलास सोनवणे को दिल्‍ली में सुनना


अभिषेक श्रीवास्‍तव 



कामरेड विलास सोनवणे
क्‍या आप विलास सोनवणे को जानते हैं? कल दिल्‍ली में उनका एक व्‍याख्‍यान था। विषय था ''धर्मांतरण की राजनीति''। विलास पुराने एक्टिविस्‍ट हैं, कोई चार दशक पहले तक मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी में हुआ करते थे। बाद में इन्‍होंने लाल किताबों के दायरे से बाहर निकलकर समाज में काम करना शुरू किया। लोकशासन आंदोलन से जुड़े। आजकल उसके कार्यकारी अध्‍यक्ष हैं। जाति और सांप्रदायिकता की राजनीति पर गहरे अनुभव रखते हैं। कम्‍युनिस्‍टों, तरक्‍कीपसंदों और समाजवादियों को जाति के प्रश्‍न पर आड़े हाथों लेने में नहीं हिचकते। सांप्रदायिकता के इतिहास को बंकिम चंद्र चटर्जी के ''आनंद मठ'' से गिनवाते हुए सावरकर तक लाते हैं और सांप्रदायिकता को ''वर्चुअल रियलिटी'' ठहराते हैं। खुलकर कहते हैं कि वे ''सेकुलर'' नहीं हैं क्‍योंकि सेकुलरवाद, सांप्रदायिकता का ''रिएक्‍शन'' है। श्रमण परंपरा की बात करते हैं। वर्गेतर सामाजिक संरचनाओं को खंगालने का आग्रह करते हैं। पीछे मुड़कर देखने को कहते हैं।


1/14/2015

दिल्‍ली में उठी छत्‍तीसगढ़ की बीस ग्राम सभाओं की आवाज़


20 ग्राम सभाओं ने किये प्रस्ताव, सरकार से आग्रह किया कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करें और कोयला खदान की नीलामी अथवा आवंटन न करें




1/11/2015

पी. साइनाथ की 'परी': उम्‍मीद पर भी सवाल बनते हैं

अभिषेक श्रीवास्‍तव 


बीते दस साल में अगर याद करें तो मुझे नहीं याद पडता कि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर जैसे एक अपमार्केट अभिजात्‍य आयोजन स्‍थल पर किसी कार्यक्रम में पांच सौ के आसपास की भीड़ मैंने देखी या सुनी होगी। राजकमल प्रकाशन के सालाना आयोजन या किसी बड़े लेखक के बेटे-बेटी के रिसेप्‍शन समारोह को अगर न गिनें, तो सामाजिक-राजनीतिक विषय पर किसी वक्‍ता को सुनने के लिए यहां सौ श्रोता भी आ जाएं तो वह अधिकतम संख्‍या होती है। इसीलिए 5 जनवरी को नियत समय से सिर्फ पंद्रह मिनट की देरी से जब मैं इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पहुंचा तो भीड़ को देखकर हतप्रभ हुए बिना नहीं रह सका। सभागार के भीतर इतने लोग थे कि दरवाज़ा खोलकर पैर रखना मुश्किल था। तब समझ में आया कि करीब दो दर्जन लोग बाहर क्‍यों मंडरा रहे थे। कार्यक्रम शुरू हो चुका था और ग्रामीण पत्रकारिता के लिए मशहूर व भारत में उसका तकरीबन पर्याय बन चुके पी. साइनाथ अपनी चिर-परिचित थॉमस फ्रीडमैन वाली शैली में मंच पर नमूदार थे। मौका था उनकी वेबसाइट पीपॅल्‍स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया (परी) के बारे में उनके परिचयात्‍मक वक्‍तव्‍य का, जिसका लोकार्पण 20 दिसंबर, 2014 को किया जा चुका था।

1/02/2015

धर्मांतरण: 'परावर्तन' से 'घर वापसी' तक 18 साल

(पिछले लेख ''चुनावी नतीजे और संघ का एजेंडा'' में हमने बताया कि कैसे जम्‍मू और कश्‍मीर विधानसभा चुनाव के हालिया नतीजों ने 'हिंदू राष्‍ट्र' की संघी परियोजना की राह का एक कांटा साफ कर दिया है। इसका दूसरा पहलू बाकी के भारत से ताल्‍लुक रखता है जहां हिंदू बहुसंख्‍यक हैं और वहां धर्मांतरण के एजेंडे को लागू किया जा रहा है। धर्मांतरण की कहानी लंबी है जैसा कि हाल में हुए कुछ उद्घाटनों ने साफ़ किया है। प्रस्‍तुत लेख जनसत्‍ता में प्रकाशित पिछले लेख का दूसरा हिस्‍सा है। ये दोनों लेख एक साथ ''समकालीन तीसरी दुनिया'' के जनवरी 2015 अंक में प्रकाशित हैं- मॉडरेटर) 


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