2/27/2015

क्रांतिवीर आज़ाद की आत्महत्या पुलिसिया थ्योरी?



राष्‍ट्रीय संवाद श्रृंखला - 1 



शाह आलम 

आज़ादी की तारीख कही जाने वाली 15 अगस्त, 1947 को 66 साल बीत जाने के बाद भी अवसरवादी ताक़तें आज़ादी के दीवाने शहीदों के अरमानों से गद्दारी करने पर तुली हैं। इंकलाबी चंद्रशेखर आज़ाद की बहदुराना शहादत को आत्महत्या कहकर क्रांतिवीर को आज तक अपमानित किया जा रहा है। स्‍कूली किताबों से लेकर इतिहास तक हर जगह हमें लगातार यही बताया गया है कि इलाहाबाद के अल्‍फ्रेड पार्क में आज़ाद ने खुद को गोली मार ली थी। यह कहानी विशुद्ध पुलिसिया संस्‍करण है जिसे आज तक किसी ने कभी भी चुनौती नहीं दी। 

2/25/2015

पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत!

ज़मीन हड़प अध्‍यादेश के खिलाफ संसद मार्ग पर विशाल रैली, 24 फरवरी 2015 


अभिषेक श्रीवास्‍तव 

लाल झण्‍डों से पटा हुआ दिल्‍ली का संसद मार्ग 

करीब तीन हफ्ते पहले की बात है जब दिल्‍ली की चुनावी सरगर्मी के बीच एक स्‍टोरी के सिलसिले में हम कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के सुनसान दफ्तरों के चक्‍कर लगा रहे थे। मतदान से ठीक एक दिन पहले 36, कैनिंग लेन में जाना हुआ जहां मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (माकपा) की किसान सभा का दफ्तर है। सत्‍तर बरस पार कर चुके किसान सभा के नेता सुनीत चोपड़ा से वहां मुलाकात तय थी। उनका आशावाद इतना जबरदस्‍त था कि कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों की बदहाली से जुड़ी किसी भी बात पर वे कान देने को तैयार नहीं थे। जब उन्‍होंने गिनवाया कि अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के देश भर में करीब 56 लाख सदस्‍य हैं और बीते दो वर्षों में यह संख्‍या तेज़ी से बढ़ी है, तो सहज विश्‍वास नहीं हुआ। फिर उन्‍होंने एक बात कही, ''हम सब मुख्‍यधारा के परसेप्‍शन ट्रैप में फंसे हुए हैं।''



2/24/2015

भूमि अधिग्रहण पर समझौते की गुंजाइश नहीं!

भूमि अध्यादेश को निरस्त करने की मांग से कोई समझौता नहीं !
भूमि अध्यादेश किसान-मजदूर विरोधी है, सरकार झूठे प्रचार में उलझा रही है    
भूमि अध्यादेश से खाद्य सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा

नई दिल्ली, फरवरी 23बहुत से अखबारों में यह खबर आई है कि एनडीए सरकार कल से शुरू होने वाले बजट सत्र के पहले भूमि अध्यादेश पर पुनर्विचार कर रही है.  हम दोहराना चाहते हैं कि भूमि अध्यादेश 2014 रद्द होना ही चाहिए. इस मुद्दे पर किसी भी तरह के समझौते की गुंजाईश नहीं है. यह भूमि अध्यादेश किसानों और प्रभावित परिवारों की सहमतिऔर सामाजिक प्रभाव आंकलनके अत्यंत महत्वपूर्ण जनतांत्रिक प्रावधानों पर हमला करता है, जो कि हमें नमंजूर है.  

2/22/2015

हिंदू रहना, जीना और मर जाना देश की उत्‍पीडि़त जनता के साथ विश्‍वासघात है

विष्‍णु शर्मा 


डाॅ. तुलसी राम ने अपने विचारों से बहुत से लोगों को प्रभावित किया। वे एक ऐसी शख्सियत थे जिनके साथ चंद पलों की मुलाकात लोगों के जीवन को ऐसे प्रभावित कर देती थी जैसा प्रभाव बहुत थोड़े लोग ही डाल पाते हैं। अब जब वे नहीं रहे तो उन्हे याद करते हुए मुझे 2003-2004 का जाड़ा याद आ रहा है जब मैंने उन्हें पहली बार सुना था। मैं काॅलेज में था और ‘संवाद’ नाम की एक संस्था में नौकरी भी करता था। वह मेरी पहली नौकरी थी। नौकरी का आकर्षण था कि मुझे अक्सर बाहर घूमने को मिलता था। 

2/11/2015

वक्त को और शाहिद आज़मियों की ज़रूरत

शाहिद आज़मी की पांचवीं बरसी पर
’लोकतंत्र, हिंसा और न्यायपालिका’ विषय पर व्याख्यान


व्‍याख्‍यान देते वरिष्‍ठ पत्रकार आनंद स्‍वरूप वर्मा 

2/04/2015

सरे-आग़ाज़े मौसम में अंधे हैं हम...


दिल्‍ली, वसंत, कुछ अजनबी चेहरे और अनसुनी आवाज़ें 


अभिषेक श्रीवास्‍तव 





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अभी दो दिन पहले दिल्‍ली से टहल-फिर कर रात में जब मैं घर लौट रहा था, तो अपनी गली में कुछ बच्‍चे एक जगह इकट्ठा दिखे। वे सब आकाश में देख रहे थे जैसे कुछ बूझने की कोशिश कर रहे हों। ये बच्‍चे मुझे शक्‍ल से जानते हैं। रोज़ देख-देख कर मुस्‍कराते हैं। इनमें एक नहर वाली बच्‍ची भी है। इस मोहल्‍ले में उसकी पहली पहचान ग़ाजियाबाद के वैशाली और इंदिरापुरम इलाकों को बांटने वाली एक नहर से है जहां बरसों पहले उसे फेंका हुआ पाया गया था। मेरे बगल की बिल्डिंग में रहने वाले लम्‍बू उसे अपने घर ले आए थे और अपने बच्‍चों के साथ पाल कर उसे बड़ा किया। उसी बच्‍ची ने सबसे पहले मुझे आते देख पूछा, ''अंकल, ये बताओ ये चांद चल रहा है कि बादल?'' मैंने आकाश में देखा। पहली नज़र में बादलों के झुटपुटे में चांद चलता हुआ नज़र आया। ध्‍यान से देखा तो चांद स्थिर था, बादल चल रहे थे। मैंने यही जवाब दिया। नहर वाली बच्‍ची ने फिर पूछा, ''अंकल, अगर बादल चल रहा है तो चांद बार-बार छुप क्‍यों जा रहा है?'' मैंने सोचा, उसे कहूं कि धरती भी तो चल रही है जिस पर वो खड़ी है, लेकिन मैं चुप रह गया। मेरी चुप्‍पी से बच्‍चे इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि चांद ही चल रहा था। नहर वाली बच्‍ची मेरी हार से खुश थी। उसे उन बादलों का ज़रा भी अहसास नहीं था, जो पिछले कुछ दिनों से चांद पर मंडरा रहे थे।


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