2/24/2015

भूमि अधिग्रहण पर समझौते की गुंजाइश नहीं!

भूमि अध्यादेश को निरस्त करने की मांग से कोई समझौता नहीं !
भूमि अध्यादेश किसान-मजदूर विरोधी है, सरकार झूठे प्रचार में उलझा रही है    
भूमि अध्यादेश से खाद्य सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा

नई दिल्ली, फरवरी 23बहुत से अखबारों में यह खबर आई है कि एनडीए सरकार कल से शुरू होने वाले बजट सत्र के पहले भूमि अध्यादेश पर पुनर्विचार कर रही है.  हम दोहराना चाहते हैं कि भूमि अध्यादेश 2014 रद्द होना ही चाहिए. इस मुद्दे पर किसी भी तरह के समझौते की गुंजाईश नहीं है. यह भूमि अध्यादेश किसानों और प्रभावित परिवारों की सहमतिऔर सामाजिक प्रभाव आंकलनके अत्यंत महत्वपूर्ण जनतांत्रिक प्रावधानों पर हमला करता है, जो कि हमें नमंजूर है.  


सरकार यह झूठा प्रचार कर रही है कि नया भूमि अध्यादेश किसानों के लिए फायदेमंद है और गांवों में बुनियादी ढांचों के निर्माण जैसे पेयजल आपूर्ति, बिजली, सड़क और गरीबों के लिए घरों के निर्माण हेतु आवश्यक है. मगर साक्ष्यों से कुछ और ही स्पष्ट होता है: 

1.      बार – बार यह देखा जा रहा है कि यह भूमि अध्यादेश प्रधानमन्त्री के प्रमुख कार्यक्रम मेक इन इण्डिया”  को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है. यह भी माना जा रहा है कि भूमि संबंधी समस्याओं की वजह से जो बिलियन डॉलर निवेश अटका हुआ है, इन सभी समस्याओं को खत्म को ख़त्म करने लिए इस अध्यादेश का सहारा लिया जा रहा है.

2.    न तो किसी राज्य सरकार ने और न ही केन्द्रीय सरकार ने 2013 के भूमि अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहित करने के प्रयास किये,  फिर भी भूमि अधिग्रहण में देरी और जटिल प्रक्रिया के झूठे भय के आधार पर भूमि अध्यादेश 2014 लाया गया.  

3.    2013 का अधिनियम 30 सालो  की अवधि में विकसित आम सहमति का परिणाम था तब   बिना किसी से परामर्श किये जल्दबाजी में एक अध्यादेश क्यों लाया गया? 

4.    न्य 13 अधिनियमों में मुआवजे के प्रावधान को विस्तारित करने का कदम अच्छा है पर बड़े स्तर पर भूमि विवाद में सिर्फ मुआवजा ही एकमात्र मुद्दा नहीं होता. सहमति और सामाजिक प्रभाव आंकलन नए कानून की आत्मा हैं, जिनके बिना 1894 के काले कानून और जबरन अधिग्रहण पर ही हम वापस पहुँच जायेंगे.
 
5.      देश की खाद्य सुरक्षा पर यह भूमि अध्यादेश गंभीर प्रभाव डालेगा, क्योंकि यह तेजी से बहु फसलीय भूमि का अधिग्रहण करने की अनुमति देगा.  

खाद्य सुरक्षा को खतरा
भारत में अभी कुल उपजाऊ भूमि 179.9 मिलियन हेक्टेयर है, जो विश्व के 17% मानव आबादी का भरण पोषण करती है. 2011-12 में भारतीय किसानों ने 259.29 मिलियन टन अनाज की पैदावार की फिर भी देश में 925 मिलियन भूख और कुपोषण के शिकार हैं. विश्वभर के कुपोषित देशो में हम दूसरे स्थान पर हैं. सरकार का अनुमान है कि वर्तमान में इसका सकल घरेलु उत्पाद में 13% योगदान है जो 2030 तक घटकर सकल घरेलु उत्पाद का 6% रह जायेगा, क्या हम उनमें से कई लोगों को रोजगार देने जा रहे हैं?  
   
2010-11 के कृषि आंकड़ों के अनुसार, 52% भारतीय श्रमिक किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भर हैं, प्रोत्साहन की बजाय 1995 से, 3 लाख किसानों ने आत्महत्या की और मुख्यरूप से खेती से जुड़े 2,358 किसान हर दिन खेती छोड़ रहे हैं [मुख्य खेतिहर किसान – साल में कम से कम 180 दिन खेती के काम से जुड़े]. 1991 तक मुख्य खेतिहर किसानों की संख्या में वृद्धि हुई थी. इसके बाद, 1999-2001 के बीच 7.2 मिलियन की गिरावट और 2001-2011 के बीच किसानों की संख्या में तकरीबन 7.7 मिलियन की गिरावट आई. इन 20 सालों में, 15 मिलियन मुख्य खेतिहर किसान खेती करना बंद कर चुके हैं. इसमें लाखों सीमांत किसानों को जोड़े. खेती की लागत बढ़ रही है, हर भारतीय किसान परिवार की औसतन मासिक आय 2115 रूपये है और हर भारतीय किसान परिवार का मासिक व्यय 2700 रूपये है, इस खेती के संकट के लिए सरकार क्या कर रही है?

भूमि अध्यादेश किसानों की भलाई के लिए नहीं है, बल्कि यह सिर्फ और सिर्फ कोर्पोरेटों के हितों के लिए लाया गया है. साफ़ हो  गया है  कि एनडीए सरकार सिर्फ कॉर्पोरेट्स और निजी व्यवसायों के लिए ही योजनाये लायी है न कि कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए.

24 फरवरी के दिल्ली आन्दोलन में आंदोलन तेज़, देश भर में जगह-जगह विरोध

जब तक भूमि अध्यादेश रद्द नहीं होता, 24 फरवरी का आंदोलन जो कि किसान संगठनों, जन आन्दोलनों, ट्रेड यूनियनों द्वारा चलाया जाएगा, वह तेज ही होता जायेगा. एकता परिषद के 5000 लोगों का मार्च 24 फरवरी को जंतर मंतर को मिलेगा और श्री अन्ना हजारे और अन्य लोग भी इसमें जुडेगे.

          24 फरवरी का महाधरना जन आन्दोलानों का राष्ट्रीय समन्वय, अखिल भारतीय वन श्रमजीवी संघ, अखिल भारतीय किसान सभा, इंसाफ,  नर्मदा बचाओ आन्दोलन, युवा क्रांति, केम्पेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी, छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन, जन पहल, किसान संघर्ष समिति, जन संघर्ष समन्वय समिति, दिल्ली सोलिडेरिटी ग्रुप, घर बचाओं घर बनाओं आन्दोलन, नेशनल फिशवर्कर फ़ोरम, राष्ट्रीय किसान संगठन, और अन्य समूहों द्वारा  आयोजित किया गया है. 

साथ ही, पटना, लखनऊ, लुधियाना, और अन्य जगहों पर देश भर में आन्दोलन और विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए हैं. 

Medha Patkar - Narmada Bachao Andolan and the National Alliance of People’s Movements (NAPM); Prafulla Samantara - Lok Shakti Abhiyan & Lingraj Azad – Samajwadi Jan Parishad NAPM, Odisha; Dr. Sunilam, Aradhna Bhargava - Kisan Sangharsh Samiti & Meera – Narmada Bachao Andolan, NAPM, MP; Suniti SR, Suhas Kolhekar, Prasad Bagwe - NAPM, Maharashtra; Gabriele Dietrich, Geetha Ramakrishnan – Unorganised Sector Workers Federation, NAPM, TN; C R Neelkandan – NAPM Kerala; P Chennaiah & Ramakrishnan Raju – NAPM Andhra Pradesh, Arundhati Dhuru, Richa Singh - NAPM, UP; Sister Celia - Domestic Workers Union & Rukmini V P, Garment Labour Union, NAPM, Karnataka; Vimal Bhai - Matu Jan sangathan & Jabar Singh, NAPM, Uttarakhand; Anand Mazgaonkar, Krishnakant - Paryavaran Suraksh Samiti, NAPM Gujarat; Kamayani Swami, Ashish Ranjan – Jan Jagran Shakti Sangathan & Mahendra Yadav – Kosi Navnirman Manch, NAPM Bihar; Faisal Khan, Khudai Khidmatgar, NAPM Haryana; Kailash Meena, NAPM Rajasthan; Amitava Mitra & Sujato Bhadra, NAPM West Bengal; B S Rawat – Jan Sangharsh Vahini & Rajendra Ravi, Madhuresh Kumar and Kanika Sharma – NAPM, Delhi

1 टिप्पणी:

ARUN KHOTE ने कहा…

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ कोई भी बड़ी लड़ाई बिना भूमिहीनों को साथ में लिये न तो लड़ी जा सकती है और न ही जीती जा सकती है l चाहें तो पिछले दो दशकों के दौरान भूमि के मुद्दे पर हुये आन्दोलनों का विश्लेषण कर लें l

सेज के खिलाफ पश्चिम बंगाल में हुए नंदीग्राम या सिंगुर के संघर्ष भले ही किसानों की भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ थे लेकिन इसके खिलाफ आन्दोलन का अग्रिम मोर्चा भूमिहीन खेत मजूरों ने ही संभाला था l केरल के चेंगेरा में हुये सफल भूमि कब्ज़े और उस भूमि का भूमिहीनों में वितरण का सफल आन्दोलन भी भूमिहीन खेत मजदूरों के सफल नेतृत्व में चला था l

हाल में उड़ीसा के नियमगिरि और पोस्को के आन्दोलन शानदार उदाहरण हैं जिसमें भूमिहीनों के शानदार आन्दोलन ने कॉर्पोरेट को पीछे हटाने पर मजबूर कर दिया था l

दूसरी तरफ अनुभव यही रहा है कि एक तरफ किसान अपनी भूमि को बचाने के आन्दोलन कर रहा है वहीँ किसान वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भूमि को मुनाफे की द्रष्टि से देखता है l वह विरोध , प्रतिरोध और आन्दोलन को भूमि की ज्यादा कीमत और ज्यादा मुवयाज़े के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है l जिसका कारण बहुत ही स्पष्ट है लेकिन भूमि के मुद्दे पर चल रहे बड़े बड़े जन आन्दोलन तक इस मुद्दे आन्दोलन के कमजोर हो जाने के खतरे को देखते हुये इस पर चुप ज्यादा बेहतर समझते हैं l

दरअसल अब समय आ गया है कि किसान की परिभाषा पर व्यापक बहस होनी चाहिए कि वास्तव में किसान किसे कहा जाये ? वह जो सीधे भूमि और कृषि पर पूर्ण रूप से निर्भर है या वह जो भूमि और कृषि को सिर्फ मुनाफे की द्रष्टि से देखता है और कृषि उसकी अतिरिक्त आय का साधन है l

भूमि को मुनाफे की द्रष्टि से देखने वाला और कृषि से अतिरिक्त आय पाने वाला किसान कॉर्पोरेट की निगाह में सबसे कमजोर कड़ी है जिस पर कॉर्पोरेट सबसे तीखी निगाह रखता है l किसान कहलाने वाला यह वर्ग ही भूमि के मुद्दे पर किसी भी जन आन्दोलन को कमजोर करने के लिये कॉर्पोरेट का सबसे सशक्त हथियार भी है l क्योंकि किसान के इस वर्ग की नई पीढ़ी जो शिक्षित भी है और बड़ी हद तक शहरीकृत हो चुकी है का कृषि के साथ कोई भी दूर दूर का रिश्ता नहीं है l

पिछले दो दशकों में किसानों का एक बहुत बड़ा वर्ग खेती के कार्य से अलग हो चूका है l भूमि और कृषि के क्षेत्र में हुये इस व्यापक बदलाव पर गंभीरता के साथ विचार की आवश्यकता है l...........................!

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