12/10/2015

यादों के सहारे : मैं विद्रोही बोल रहा हूं!




महताब आलम 



आगे विद्रोही और पीछे महताब आलम 

दिल्ली के किसी नए लैंडलाइन/मोबाइल नंबर से मेरे मोबाइल पर घंटी बजती है तो दिल से निकलता है, लो आ गया फिर किसी लोन देने वाले/फ्लैट दिलाने वाले/गाड़ी बेचने वाले/बीमा एजेंसी वाले का फोन! मन होता है कि न उठाऊँ, और कई बार नहीं भी उठाता हूं, लेकिन फिर ये भी खयाल होता है क्या पता किसी परिचित का फोन हो। बैलेंस 'नहीं' होगा इसलिए ऑफिस के फोन से कर रहे हों या फिर किसी साथी के फोन से। और ऐसा हुआ भी है, कई बार। सो उठा लेता हूं अननेम्ड कॉल्स भी। क्या पता कोई ज़रूरी कॉल छूट जाये इन कमबख्तों के चक्कर में। ऐसे नम्बरों से आने वाले कॉल्स में इन कस्टमर केयर और कॉल सेंटर से आने वाले कॉल्स के बाद सबसे ज़यादह आता है एक अहम कॉलफोन उठाते ही एक चिर-परिचित आवाज़ उभरती है: "हेलो कामरेड महताब...!" मैं समझ जाता हूं, ये विद्रोहीजी बोल रहे हैं- उनके बोलने से पहले कि "मैं विद्रोही बोल रहा हूं"!



आप सोच रहे होंगे, ये विद्रोही कौन है भाई? विद्रोही- जैसन नाम, वैसन काम। वैसे असल नाम है उनका रमाशंकर यादव। बहुत कम लोग जानते हैं इनका ये नाम। मैं भी हाल-फ़िलहाल में जान पाया। जन्मे 3 दिसंबर 1957 को अईरी फिरोजपुर, ज़िला सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में रामनारायण यादव और करमा देवी के घर। उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्‍थान से एलएलबी कर रहे थे कि छात्र राजनीति में आ गए। आन्दोलन के दौरान कालिज से निष्काषित हुए। दिल्ली का रुख किया। जेएनयू पहुंचे, एमए में दाखिला लिया, पर आदत न गई (मुझे लगता है जानी भी नहीं चाहिए)। सो यहां भी निष्कासित हुए। पर अबकी बार ठान लिया वापस नहीं जाएंगे। सो तब से यहीं हैं। जेएनयू कैम्पस में। तीस साल हो चुके हैं। कई बार हमेशा के लिए कैम्पस से निकाले जाने के भरपूर कोशिश भी हुई है, पर नाकाम। आज के दिन में ये कहा जा सकता है और इसमें कोई शक नहीं कि अगर विद्रोही जेएनयू के बाहर नहीं रह सकते तो ये उस से बड़ा सच है कि जेएनयू में पढ़ने वाले और पढ़े छात्र-छात्राओं की बड़ी तादाद इनके बिना नहीं रह सकती।




मुझे तारीख और साल तो ठीक-ठीक नहीं याद, पर इतना ज़रूर याद है कि कम से कम पांच या छह साल पुरानी बात है जब विद्रोहीजी को पहली बार सुनने और देखने का मौक़ा मिला। स्थान भारतीय लोकतंत्र का बैरोमीटर कहा जाने वाला जंतर-मंतर। ये और बात है कि ये हम में से कई साथियों को  बैरोमीटर कम और सेफ्टी-वाल्व ज़यादह लगता है... खैर, अभी इसका वक़्त नहीं है और बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। हां, तो मैं कह रहा था विद्रोहीजी के बारे में। और तब का दिन है और आज का दिन... मैंने उनको हर लोकतान्त्रिक आन्दोलन का हिस्सा पाया है- 'पार्टी' लाइन से परे। मैंने जब उनको पहली बार सुना तो भुला न पाया। आज भी जब विद्रोहीजी का नाम आता है तो सबसे पहले याद आती है उनकी कविता 'गुलाम' की ये पंक्तियां, जो उस वक़्त सुनी थीं:

बगदाद और बदख्शा में खुल्लम-खुल्ला बिकते थे गुलाम
सीरिया और काहिरा में पट्टा होते थे गुलाम
बेतलहम-येरुशलम में गिरवी होते थे गुलाम
रोम में और कापुआ में रेहान होते थे गुलाम
मंचूरिया-शंघाई में नीलाम होते थे गुलाम
मगध-कौशल-काशी में बेनामी होते थे गुलाम 
और सारी दुनिया में किराये पर उठते थे गुलाम...

मैं इतिहास का विद्यार्थी या जानकार तो नहीं, पर जहां तक मेरा अध्ययन है, गुलामों/गुलामी के इतिहास की व्याख्या इतने सरल शब्दों में कहीं और नहीं पढ़ी।  विद्रोहीजी की सबसे बड़ी और अहम बात ये है कि वो कविताएं लिखते नहीं, कहते हैं। मतलब वो कविताओं की रचना के लिए कलम और कागज़ का इस्तेमाल नहीं करते, न ही कहीं और लिखते हैं। वो कवितायेँ कहते हैं और सुनाते हैं। संक्षेप में कहूं तो वो मौखिक प्रथा और धारा के मानने वाले हैं। और यही वजह हैं कि तीन दशक से ज़यादह से भी जेएनयू में रहने के बावजूद वे 'सिर्फ' कवि हैं, जबकि उनके मित्र-साथी, सहपाठी तुर्रमखां हो गए और न जाने क्या-क्या हो गए। क्या प्रोफ़ेसर, क्या वीसी, क्या वकील, क्या आईएएस। लोग ये भी बताते है कि विद्रोहीजी को जेएनयू से निष्काषित किए जाने की एक वजह ये है कि उनका कहना था कि वो अपनी परीक्षा मौखिक देंगे और डिजरटेशन भी मौखिक रूप से ही जमा करेंगे।

----------------------------------------------------------------------------------

तीन साल पहले विद्रोहीजी पर कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था, पूरा नहीं कर पाया। कल जब उनके चल बसने की खबर मिली तो मुझे उनकी ये पंक्तियां याद आईं:

मुझको लगता है कि मैं गुनहगार हूं
क्योंकि रहता हूं मैं कैदियों की तरह
मुझको लगता है मेरा वतन जेल है
ये वतन छोड़ कर अब कहाँ जाऊँगा
अब कहाँ जाऊँगा जब वतन जेल है
जब सभी कैद हैं तब कहाँ जाऊँगा
मैं तो सब कैदियों से यही कह रहा
आओ उनके हुकुम की उदूली करें
पर सब पूछते हैं कि वो कौन हैं और कहाँ रहता है
मैं बताऊँ कि वो एक जल्लाद है
वो वही है जो कहता है हक छोड़ दो
तुम यहां से वहां तक कहीं देख लो
गाँव को देख लो शहर को देख लो
अपना घर देख लो अपने को देख लो
इस हक़ की लड़ाई में तुम किस तरफ हो
आपसे कह रहा हूं अपनी तरह
कि मैं तो सताए हुओं की तरफ हूं
और जो भी सताए हुओं की तरफ है
उसको समझता हूं कि अपनी तरफ है
पर उनकी तरफ इसकी उलटी तरफ है
उधर उनकी तरफ आप मत जाइए
जाइए पर अकेले में मत जाइए
ऐसे जायेंगे तो आप फंस जाएंगे
आइए अब हमारी तरफ आइए
आइए इस तरफ की सही राह है।


 अलविदा विद्रोही जी





(महताब आलम बुनियादी तौर पर मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, लेकिन जरूरत भर लिखने के लिए स्वघोषित स्वतंत्र पत्रकार। दिल्ली में ठिकाना है, पर घुमंतू भोटिया)

कोई टिप्पणी नहीं:

प्रकाशित सामग्री से अपडेट रहने के लिए अपना ई-मेल यहां डालें