11/22/2016

नोटबंदी के खिलाफ़ जनता का गीत


हमें हिसाब चाहिए
(गीतकार: पीयूष बबेले, वरिष्‍ठ पत्रकार, इंडिया टुडे





10/22/2016

सुकमा-2011 हमले में सीबीआइ की चार्जशीट दायर, शांतिवार्ता के लिए कोर्ट ने दिया कोलंबिया का उदाहरण


प्रेस विज्ञप्ति, 21 अक्टूबर 2016




11 मार्च और 16 मार्च 2011 के बीच सुकमा के अतिरिक्त एसपी डीएस मरावी के नेतृत्व में एक पुलिस दल ने मोरपल्ली, टाडमेटला और तिमापुरम गांवों में ‘‘एसएसपी दांतेवाड़ा के आदेश के अनुसार’’ (डीएस मरावी द्वारा दर्ज प्राथमिकी 4/2011) छापेमारी अभियान (काम्बिंग आपरेशन) चलाया। इस पुलिस दल में पुलिस, एसपीओ और सीआरपीएफ के जवाल शामिल थे। गौरतलब है कि उस समय दांतेवाडा़ के एसएसपी एस.आर.पी. कल्लूरी थे।

10/19/2016

गोलियथ पर डेविड की नैतिक जीत के बाद एक चुभता हुआ सवाल: कब अपना कम्‍फर्ट ज़ोन छोड़ोगे?



अहमर खान
(केंद्रीय मंत्री स्‍मृति ईरानी द्वारा अपनी शैक्षणिक योग्‍यता के संबंध में चुनाव आयोग को गलत जानकारी देने के मामले में इस देश के एक आम युवा ने अदालत से शिकायत की थी। पैंसठ करोड़ युवाओं की इस वीरभोग्‍या धरती पर उसका नाम कुछ भी हो सकता था, लेकिन यह दिल्‍ली के अहमर खान का ही साहस और संकल्‍प था कि उसने इतनी बड़ी पहल की और उसे डेढ़ साल तक अपने बेरोज़गार कंधों पर कुछ बेरोज़गार दोस्‍तों के सहारे ढोते रहे। ईसाई धर्मग्रंथ की परंपरा से उधार लें तो कह सकते हैं कि यह लड़ाई विशुद्ध डेविड बनाम गोलियथ की थी। एक केंद्रीय मंत्री बनाम एक अदद युवक की लड़ाई। ज़ाहिर है, अहमर केस हार गए और अदालतों ने उनके ऊपर केंद्रीय मंत्री के 'उत्‍पीड़न' का आरोप भी लगे हाथ मढ़ दिया। 

फैसले के अगले दिन फेसबुक पर आया अहमर खान का यह बयान बेहद अहम है। हम इसे अविकल प्रकाशित कर रहे हैं। अहमर ने हार नहीं मानी है और उन्‍होंने कुछ अहम सवाल हमारे लिए छोड़ दिए हैं। यह मुकदमा आगे दूसरी अदालतों में चले या नहीं, लेकिन स्‍वतंत्र भारत में इस बात की नज़ीर बेशक़ बन चुका है कि एक आम आदमी एक खास आदमी को उसकी ग़लतियों के लिए कानूनी तरीके से ''उत्‍पीडि़त'' कर सकता है। हम जिस दौर और देश में जी रहे हैं, उसमें यह डेविड की गोलियथ पर हुई जीत है, भले मुकम्‍मल न हो! - मॉडरेटर)


10/17/2016

कश्‍मीर के नए हालात को संबोधित करें!

(कश्‍मीर में जारी संकट का कोई समाधान नहीं दिख रहा, न ही कोई इसे गंभीरता से संबोधित करने की कोशिश कर रहा है। यह संकट अतीत के संकटों से बुनियादी रूप से भिन्‍न है। बीते 11 अक्‍टूबर को दि हिंदू में पूर्व राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन ने इस पर चिंता जताते हुए एक लेख लिखा था। यह लेख हम हिंदी में प्रस्‍तुत कर रहे हैं। अव्‍वल तो इसलिए कि इसका लेखक राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहने के बावजूद कश्‍मीर में अपनाए जा रहे सरकारी नुस्‍खों को लेकर आलोचना का स्‍वर रखता है। दूसरे इसलिए भी कि हिंदी के पाठकों को यह लेख ज़रूर पढ़ना चाहिए ताकि युद्धोन्‍माद के माहौल में थोड़ा विवेक कायम हो सके- मॉडरेटर)


10/15/2016

'नास्तिक दोस्‍तों के साथ मस्‍ती' पर हमला: एक नोट


अभिषेक श्रीवास्‍तव 





वृंदावन के ''ऐंवेंइ मस्‍ती विद नास्तिक फ्रेंड्स'' नामक आयोजन को धार्मिक गिरोहों ने दबाव और हिंसा से रुकवा दिया है। यह गलत हुआ है, सरासर गलत। इसका विरोध होना चाहिए। साथ ही आयोजन पर भी बात होनी चाहिए। उसमें जाने वालों पर भी और नास्तिकता की समझदारी पर भी, जिसे लेकर लोग वहां गए थे। इस लेख को लिखने मुझे जो वजह समझ में आ रही है, उसे मैं एक लतीफ़े से ही समझा सकता हूं। उसके बाद दार्शनिक बातें...।

9/15/2016

समाजवादी पार्टी की ''आउटसाइडर'' गुत्‍थी: संदर्भ सुभाष चंद्रा और कैलाश सत्‍यार्थी


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


बाएं से जयाप्रदा, अमर सिंह, सुभाष चंद्रा, मधुर भंडारकर और सुधीर चौधरी 

कुछ बातें समझ में नहीं आती हैं। उन्‍हें यूं ही छोड़ा जा सकता है। कुछ बातें समझ कर भी समझ में नहीं आती हैं। उन्‍हें छोड़ना मुश्किल होता है।

रविवार 11 सितंबर की रात समाजवादी पार्टी के अमर सिंह ने बीजेपी से राज्‍यसभा सांसद और ज़ी मीडिया के मालिक सुभाष चंद्रा के सम्‍मान में पार्टी आयोजित की। पार्टी में दो अहम लोग नहीं आए- एक अखिलेश यादव और दूसरे ज़ी बिज़नेस के संपादक समीर अहलुवालिया। बाकी मुलायम सिंह यादव से लगायत उनका पूरा कुनबा और सभी करीबी नौकरशाह इसमें मौजूद थे। अगले दिन सुबह तीन घटनाएं हुईं।

9/13/2016

हिंदीवालों, साहित्‍य अकादमी ने सुभाष चंद्रा का लेक्‍चर सुनने को न्‍योता भेजा है! छाती पीटोगे?


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


पिछले हिंदी दिवस को याद करिए। न सही छप्‍पन इंच लेकिन हम हिंदीवालों की छाती चौड़ी हो गई थी कि हमारा हिंदी का लेखक-कवि खुलकर मैदान में आया है, पुरस्‍कार लौटा रहा है और बरसों बाद प्रतीकात्‍मक ही सही लेकिन एक राजनीतिक कार्रवाई तो कर रहा है। पहला पुरस्‍कार 4 सितंबर को उदय प्रकाश ने लौटाया था साहित्‍य अकादमी का। इस घटना के एक साल दस दिन बाद क्‍या मंज़र है, आप जानते हैं? नहीं?

9/06/2016

(फ्री) सेक्स विमर्श को यहां से देखो राष्ट्रवादियों!



विश्‍वदीपक 
फ्री सेक्स के मुद्दे पर राष्ट्रवादियों के शुद्धतावादी अभियान का अंत हुए हालांकि कुछ वक्त बीत चुका है, लेकिन इस अंत ने उस गलनशील वैचारिकी के नंगेपन को उधेड़ने की शुरुआत कर दी है जिसे भगवाधारी फासीवादी भारत का स्वर्णिम इतिहास कहते हैं. बहस की शक्ल में चलाए गए इस अभियान के खोखलेपन ने यह साबित कर दिया है कि भगवाधारी विचारधारा न सिर्फ राजनीतिक बल्कि ऐतिहासिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर भी कूपमंडूक, अवैज्ञानिक और अतार्किक है. इसके अनुगामियों का हाल कुएं के उस मेढक की तरह है जिसे न कुएं की गहराई का अहसास है और न ही कुएं के बाहर के आकाश का अंदाजा है. बहस शुरु हुई थी फ्री सेक्स के मुद्दे पर एपवा (ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोशिएशन) सेक्रेटरी कविता कृष्णन की एक पोस्ट और फिर उस पोस्ट के समर्थन में कविता की मां  की समर्थन भरी स्वीकारोक्ति के बाद. जेएनयू विवाद के दौरान कविता ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी समेत जेएनूय के कुछ शिक्षकों की सोच पर सवाल उठाते हुए लिखा कि जिस सेक्स में स्वतंत्रता का अहसास नहीं है, वह रेप के बराबर है. बस फिर क्या था सोशल मीडिया पर सक्रिय भगवाधारी सेना महान भारतीय संस्कृति, वेद-पुराण, परिवार, नैतिकता के हथियारों से लैस होकर उन पर टूट पड़ी. इस प्रक्रिया में कविता की मां का भी नाम भी घसीटा गया लेकिन कविता की मां, लक्ष्मी कृष्णन ने न सिर्फ उनका समर्थन किया बल्कि स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि उन्होंने फ्री सेक्स का आनंद लिया है. लक्ष्मी कृष्णन की मां के कबूलनामे ने जख्म में नमक डालने का काम किया जिसकी छटपटाहट भगवाधारियों को लंबे समय तक महसूस होगी.  


8/08/2016

भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार-2016 के निर्णायक उदय प्रकाश का आधिकारिक वक्‍तव्‍य

(कवयित्री शुभमश्री को मिले भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार पर विवाद लगातार जारी है। उनकी कविताओं का हर कोई अपने तरीके से मूल्‍यांकन कर रहा है और पक्ष या विपक्ष में आवाज़ें आ रही हैं। ऐसे में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि पुरस्‍कार के निर्णायक कथाकार उदय प्रकाश ने क्‍या सोच कर 'पोएट्री मैनेजमेंट' को इस बार का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार दिया। निर्णायक के वक्‍तव्‍य के बाद शायद कुछ धूल छंटे और स्‍वस्‍थ बहस का रास्‍ता खुले। जनपथ पर पढ़ें निर्णायक उदय प्रकाश का 2016 के भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार पर आधिकारिक वक्‍तव्‍य - मॉडरेटर) 



भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार-2016 के निर्णायक उदय प्रकाश का आधिकारिक वक्‍तव्‍य

(कवयित्री शुभमश्री को मिले भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार पर विवाद लगातार जारी है। उनकी कविताओं का हर कोई अपने तरीके से मूल्‍यांकन कर रहा है और पक्ष या विपक्ष में आवाज़ें आ रही हैं। ऐसे में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि पुरस्‍कार के निर्णायक कथाकार उदय प्रकाश ने क्‍या सोच कर 'पोएट्री मैनेजमेंट' को इस बार का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार दिया। निर्णायक के वक्‍तव्‍य के बाद शायद कुछ धूल छंटे और स्‍वस्‍थ बहस का रास्‍ता खुले। जनपथ पर पढ़ें निर्णायक उदय प्रकाश का 2016 के भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार पर आधिकारिक वक्‍तव्‍य - मॉडरेटर) 



8/04/2016

ये शहर आब को तरसेगा चश्‍म-ए-तर के बगैर...


बनारस: सावन, 2016 


अभिषेक श्रीवास्‍तव 





एक 

ये कहानी सावन की है। सावन, जो बीते कुछ वर्षों में पहली बार ऐसे आया है गोया वाकई पहली बार ही आया हो। वरना हर बार सावन बीत जाता था और मन सूखा रह जाता था। इस बार चहुंओर बरसा है। ठीकठाक बरसा है। इस बारिश का ही जादू था, रामजी यादव के न्‍योते का कम, कि हम बीते शनिवार झोला उठाकर कांवडि़यों की भीड़ को चीरते हुए काशी विश्‍वनाथ से खरामा-खरामा बनारस पहुंच गए।


7/21/2016

हाशिम अंसारी होने का मतलब


शाह आलम



''जब मैंने सुलह की पैरवी की थी तब हिन्दू महासभा सुप्रीम कोर्ट चली गई। महंत ज्ञानदास ने पूरी कोशिश की थी कि हम हिंदुओं और मुस्लिमों को इकट्ठा करके मामले को सुलझाएं, लेकिन अब मुकदमे का फैसला कयामत तक नहीं हो सकता है। इस मुद्दे को लेकर सभी नेता अपनी रोटियां सेक रहे हैं....बहुत हो गया अब''।  


7/05/2016

ऑपरेशन जवाहरबाग: कचहरी में भटकता एक काला कोट


रामवृक्ष यादव के वकील तरणी कुमार गौतम 

अगर कोई एक शख्‍स 2 जून की घटना के बाद साहस और सरोकार के साथ धारा के खिलाफ तैर रहा है तो वह है रामवृक्ष का वकील तरणी कुमार गौतम, जिसे यह भी पता नहीं है कि उसका क्‍लाइंट जिंदा है या मर गया। 11 जून की सुबह मुलाकात करने का वादा कर के गौतम बाद में तीन बार फोन नहीं उठाते और आधा घंटा अपने चैंबर नंबर 21 में इंतज़ार करवाने के बाद अचानक पसीना पोंछते हुए प्रकट होते हैं। दो और व्‍यक्ति जो काफी देर से उनका इंतज़ार कर रहे थे, उन्‍हें देखते ही खड़े हो जाते हैं। पहला व्‍यक्ति कुछ शिकायती लहजे में मुंह बनाता है तो वे जवाब देते हें, ''तुम्‍हारी ही तारीख लेने गया था.. कोर्ट से आ रहा हूं। सारा काम निपटा दिया।'' वे उसे एक काग़ज़ पकड़ाते हैं और बदले में वह व्‍यक्ति उन्‍हें 100 रुपये का नोट थमाता है। उसके चले जाने के बाद वे हमारी ओर मुड़ते हैं।

7/03/2016

ऑपरेशन जवाहरबाग : फरियादोंं की फेहरिस्‍त पर बैठा और ऐंठा शासन


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


कोई चार दिन हुए होंगे जब मेरे पास मथुरा से एक फोन आया। नंबर अनजान था। उधर से आवाज़ आई, ''साहेब, आपक नंबर हमै वकील साहब दिये रहिन... हम जगदीश बोल रहे हैं।'' बातचीत के बीच-बीच में उसकी आवाज़ कमज़ोर पड़ रही थी तो कभी अचानक तेज़ हो जा रही थी। आज उसकी एक तस्‍वीर मुझे मिली, तो इसका राज़ समझ में आया। जगदीश के दोनों हाथ पुलिस ने तोड़ दिए हैं। वह अपने हाथ से पानी भी नहीं पी सकता। ज़ाहिर है, उस दिन वह फोन पर बात कर रहा था तो मोबाइल किसी और ने पकड़ रखा था, जिसके रह-रह कर हिलने से आवाज़ खराब हो जा रही थी।

जगदीश, पुत्र परागलाल, नि. कैसरगंज, बहराइच 

7/02/2016

ऑपरेशन जवाहरबाग : भरोसे की बरसी, रामभरोसे की मौत



अभिषेक श्रीवास्‍तव 





ठीक महीने भर पहले सैकड़ों लोगों के एक भरोसे की मौत हुई थी। कल रात रामभरोसे की भी मौत हो गई। इस बीच मथुरा में जाने कितनी मौतें हुई होंगी और आगे जाने कितनी और होंगी, लेकिन जवाहरबाग की कहानी अब हमारे ज़ेहन का हिस्‍सा नहीं है। ये दौर ही ऐसा है जब बड़ी से बड़ी कहानी की उम्र हफ्ते भर से ज्‍यादा नहीं होती, लेकिन मथुरा वाले जानते हैं कि जवाहरबाग में 2 जून, 2016 की शाम जो घटा था, उसकी उम्र काफी लंबी है। अरसा हुआ यह देखे हुए कि कोई अख़बार पूरे एक महीने तक किसी घटना को विशेष कवरेज देता रहे और उसे ख़बरों की कमी न पड़े। मथुरा का जवाहरबाग अगर आज भी ''ऑपरेशन जवाहरबाग'' के नाम से अमर उजाला के दूसरे पन्‍ने पर लगातार जगह पा रहा है, तो यह बात नज़रअंदाज़ करने योग्‍य कतई नहीं है।

6/24/2016

दिल्‍ली-23 जून, 2016 : 'अपने जैसोंं' के गिरोह और उठ खड़े होने की एक अदद धुन


पहला प्रफुल्‍ल बिदवई स्‍मृति पुरस्‍कार, 23 जून 2016, दिल्‍ली 


दिल्‍ली मुझे पसंद है। इसलिए नहीं कि वह राहत देती है, इसलिए कि वह झकझोरती है। सोचने को मसाला देती है। दिमाग के पट पर दस्‍तक देती है। थोड़ा टेढ़ा होकर देखने की सहूलियत देती है। मैं अचानक यह बात क्‍यों कह रहा हूं? मेरे एक प्राचीन मित्र हैं जो आजकल पूर्वांचल पर केंद्रित एक टेबलॉयड निकाल रहे हैं। इसके पहले भी वे तमाम किस्‍म के पत्रकारीय/अलाइड धंधे शुरू कर के बंद कर चुके हैं लेकिन कभी उन पर लिखने का ऐसा मन नहीं बना। उन्‍होंने दरअसल कल यानी गुरुवार 23 जून को अपने अख़बार की ओर से एक भव्‍य आयोजन करवाया दिल्‍ली के श्रीराम सेंटर में, जिसमें दर्जन भर लोगों को सम्‍मानित किया गया, मालिनी अवस्‍थी का नाच-गाना हुआ और रात में भोजन भी हुआ। मैं वहां जिस माहौल से होकर पहुंचा था, वह भी एक सम्‍मान समारोह ही था लेकिन कतई अलहदा। शाम छह बजे कांस्टिट्यूशन क्‍लब में मरहूम पत्रकार प्रफुल्‍ल बिदवई की पहली बरसी पर उनकी स्‍मृति में एक पुरस्‍कार दिया जाना था और मीडिया के संकट पर परंजय गुहा ठाकुरता का व्‍याख्‍यान था। यहां अध्‍यक्षता इतिहासकार रोमिला थापर कर रही थीं जबकि पूर्वा सम्‍मान आयोजन की अध्‍यक्षता केंद्रीय मंत्री नोएडा वाले महेश शर्मा को करनी थी। कंट्रास्‍ट देखिए- वैचारिक भी दिखेगा, भाषायी भी दिखेगा, वर्गीय भी दिखेगा, और भी बाकी बहुत कुछ दिखेगा, जो अन्‍यथा न दिख पाता अगर मित्र अवतंस चित्रांश ने यह कार्यक्रम दिल्‍ली की जगह बनारस में रखा होता। यह संयोग ही रहा कि दोनों आयोजनों का समय भी आसपास था और आयोजन स्‍थल की दूरी भी, वरना कुछ बुनियादी चीज़ें वाकई मेरी समझ से बाहर रह जातीं।

6/20/2016

पिता पर एक लंबी कविता



मेरे भीतर दो पिता 


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


6/13/2016

जल्‍द आ रहा है केवल जनपथ पर...





समाजवादी पार्टी से राज्‍यसभा में गए ठाकुर अमर सिंह ने कहा है कि जवाहरबाग में नक्‍सली थे। क्‍या आप जानना चाहेंगे अमर सिंह के नक्‍सली कैसे दिखते हैं? मीडिया कह रहा है कि जवाहरबाग में रॉकेट लॉन्‍चर मिला। क्‍या आपको पता है कि बाग में हथियार के नाम पर क्‍या था? कुछ लोग रामवृक्ष यादव को सनकी बता रहे हैं। जेल में बंद एक सत्‍याग्रही औरत ने बच्‍चा जना तो उसका नाम रामवृक्ष रख दिया। इसका मतलब ये औरत भी सनकी है। इसकी तरह वे हजारों लोग भी सनकी थे जो जवाहरबाग में इकट्ठा थे। तो क्‍या इस देश में सनकी लोगों को जिंदा रहने का हक नहीं? उन्‍हें गोली से मार दिया जाएगा? आग में झोंक दिया जाएगा?  अस्‍पताल में हथकड़ी बांधकर रखा जाएगा? कौन है इस देश में असल सनकी? जो मरा या जिसने सनकी समझ कर इंसान को मारा? या फिर वो जो सनकियों की मौत को अपनी सनक लागू करने में भुना रहा है?  

सवाल कई हैं। सब अनसुलझे। चैनलों और अखबारों की भीड़ में एक रिपोर्ट ऐसी नहीं है जो जवाहरबाग का सच्‍चा चेहरा दिखा सके। जानना है कि 2 जून, 2016 को जवाहरबाग में क्‍या हुआ? देखते रहिए जनपथ... 

मथुरा के जवाहरबाग की सच्‍ची कहानी, प्रत्‍यक्षदर्शियों की जुबानी, अनकट... 

5/29/2016

GUJARAT FILES : सच, साहस और थोड़ी-सी विनम्रता का सत्‍ता-विमर्श



अभिषेक श्रीवास्‍तव 


राणा अयूब 


अपने मीडिया अंक के लिए अर्नब गोस्‍वामी से एक बार कारवां पत्रिका ने साक्षात्‍कार लेने की कोशिश की थी। उस वक्‍त अर्नब ने जो जवाब दिया था, वह अब तक याद रह गया- जर्नलिस्‍ट्स आर नॉट स्‍टोरीज़ यानी पत्रकार खुद ख़बर नहीं होते। अर्नब गोस्‍वामी की पत्रकारिता पर सवाल बेशक हो सकते हैं, लेकिन ऐसी निस्‍पृहता एक बुनियादी किस्‍म की ईमानदारी की मांग करती है जहां पत्रकार के लिए ख़बर से ज्‍यादा अहम कुछ नहीं है, अपनी जिंदगी भी नहीं। यह बात अलग है कि शनिवार की शाम इंडिया हेबिटैट सेंटर में पत्रकार राणा अयूब की किताब ''गुजरात फाइल्‍स'' का लोकार्पण अर्नब समेत किसी भी मीडिया संस्‍थान के लिए ख़बर नहीं बना।

5/20/2016

आज खुश तो बहुत होगे तुम...



प्रधानमंत्री के नाम एक भक्‍त का खुला पत्र 


व्‍यालोक 






आदरणीय प्रधानमंत्री
नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदीजी,

आज, खुश तो बहुत होंगे आप। आखिर, कांग्रेसमुक्त भारत का आपका सपना पूरा होने वाला जो लगता है। पांच राज्यों के आए चुनावी नतीजों ने कांग्रेस को और भी हाशिए पर धकेल दिया है। पूर्वोत्तर में आपका खाता खुल गया है, असम में पहली बार पूर्ण बहुमत से आपकी सरकार बनने वाली है। तो क्या हुआ, अगर इस जीत की अगुवाई एक पूर्व कांग्रेसी कर रहा है। तमिलनाडु और केरल में आपका कुछ भी दांव पर ही नहीं था, तो वहां कांग्रेस का बुरी तरह सफाया ही आपके लिए राहत की बात है।

5/15/2016

पल्‍लवी जोशी: तीस साल बाद एक नुक्‍़ते की खूबसूरत ख़तावार

अभिषेक श्रीवास्‍तव 



शायद तीस साल पहले पल्‍लवी जोशी से मेरा परिचय हुआ था। तब मैं छोटा बच्‍चा था और वे टीवी के सीरियलों में काम करती थीं। मुझे अच्‍छे से याद है कि दूरदर्शन पर आने वाले तमाम धारावाहिकों में अगर मैं किसी एक चेहरे को अच्‍छे से पहचानता था, तो वह उन्‍हीं का चेहरा था। शायद, वह बेदाग खूबसूरती रही होगी या कुछ और, लेकिन बड़ी होती उम्र में भी श्‍याम बेनेगल का 'भारत एक खोज' देखने की बड़ी वजह पल्‍लवी जोशी ही रहीं। ये बात अलग है कि 'भारत एक खोज' मिडिल स्‍कूल में उतना समझ में नहीं आता था, फिर भी मैं नियम से उसे देखता था।

5/04/2016

भाई राहुल पंडिता, आपका ध्‍यान किधर है? ''कुंठा की गिलहरी'' इधर है!


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


राहुल पंडिता दौड़ाक, साइकिल चालक के अलावा दक्ष गोताखोर भी हैं।  


दिल्‍ली आने के बाद अर्जित शुरुआती अनुभवों में एक अनुभव जो सबसे दिलचस्‍प रहा, वह था सड़क पर होने वाले झगड़ों-झंझटों और टकरावों का। मैं तकरीबन रोज़ ही ऐसे टकरावों का गवाह ब्‍लू लाइन या डीटीसी में बनता था। मसलन, धक्‍कामुक्‍की की किसी घटना या किसी की बाइक दूसरे की कार से छू जाने के बाद किन्‍हीं दो व्‍यक्तियों के बीच कहासुनी शुरू होती थी। ''मैं तेरे को देख लूंगा'', जैसे मशहूर वाक्‍यों को बार-बार दुहराया जाता। बीच-बीच में दिल्‍लीआइट गालियों का तड़का भी मारा जाता। हर वाक्‍य के बाद लगता कि दोनों में से कोई एक हाथ छोड़ देगा, लेकिन तमाशबीनों को निराशा हाथ लगती। बिलकुल मारपीट की कगार पर पहुंच कर विवाद थम जाता। ''चल, चल, बड़ा आया है...'' जैसे वाक्‍यों के बाद एकाध पलटा-पलटी होती, फिर भीड़ खत्‍म।

4/20/2016

मैं और मेरा सच: जनपथ पर लंबे सन्नाटे का सबब


अभिषेक श्रीवास्तव 


बहुत से लोगों ने इधर बीच पूछा कि जनपथ क्‍यों ठप पड़ा हुआ है। मेरे पास कोई कन्विंसिंग जवाब नहीं था। अब भी नहीं है। अगर जवाब जानना ही हो तो आप इसे प्रथम दृष्‍टया आलस्‍य कह सकते हैं। आलस्‍य भी क्‍या, मेरे हिसाब से एक किस्‍म की अन्‍यमनस्‍कता, एक बेपरवाही वाला भाव। जवाब इससे भी हालांकि पूरा नहीं होता। अब जब लिख ही रहा हूं, तो कायदे से बात हो जानी चाहिए।

3/08/2016

ठगा जाना आपका अपना चुनाव है!


स्मृति सिंह 

बात कन्‍हैया कुमार के भाषण से निकली तो इस बात का अंदाज़ा हुआ कि कितना संजीदा मुद्दा है ये मौजूदा राजनैतिक दौर का। कन्‍हैया कुमार बोले कि इंस्टेंट मेसैज और मीम के आधार पर राजनीति हो रही है और जेएनयू में पढ़ने वालों की बातें आम लोगों के सर के ऊपर से निकल जाती हैं। बात आत्म-मनन की भी है और चिंतन की भी। हाँ, शायद बड़े बड़े लफ्ज़, गूढ़ वैचारिक सिद्धांत और शब्दावली समझ बनाने में दिक्कत पैदा करते है। तो क्या आम समझ और गहन समझ के अंतर अंकित कर दिए जाये? क्या आम जनता गहन समझ बनाने में असमर्थ है या हम पंडे का पद ग्रहण कर आम जनता को अपने आकलन अनुसार नाप तोल कर गहन विचार पचाने-लायक हिस्सों में परोसने के पक्षधर बन रहे हैं? आम समझ और गहन समीक्षा का भेद इतना गहरा कैसे हो सकता है कि उसे संवाद लांघ पाये? राजनीति फिर किस स्तर पर की जानी चाहिए, आम समझ के स्तर पर या गहन समझ के स्तर पर? या आम समझ के स्तर पर अलग और गहन समझ के स्तर पर अलग राजनीति होनी चाहिए, जो शायद इस दौर में हो भी रही है।

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