3/08/2016

ठगा जाना आपका अपना चुनाव है!


स्मृति सिंह 

बात कन्‍हैया कुमार के भाषण से निकली तो इस बात का अंदाज़ा हुआ कि कितना संजीदा मुद्दा है ये मौजूदा राजनैतिक दौर का। कन्‍हैया कुमार बोले कि इंस्टेंट मेसैज और मीम के आधार पर राजनीति हो रही है और जेएनयू में पढ़ने वालों की बातें आम लोगों के सर के ऊपर से निकल जाती हैं। बात आत्म-मनन की भी है और चिंतन की भी। हाँ, शायद बड़े बड़े लफ्ज़, गूढ़ वैचारिक सिद्धांत और शब्दावली समझ बनाने में दिक्कत पैदा करते है। तो क्या आम समझ और गहन समझ के अंतर अंकित कर दिए जाये? क्या आम जनता गहन समझ बनाने में असमर्थ है या हम पंडे का पद ग्रहण कर आम जनता को अपने आकलन अनुसार नाप तोल कर गहन विचार पचाने-लायक हिस्सों में परोसने के पक्षधर बन रहे हैं? आम समझ और गहन समीक्षा का भेद इतना गहरा कैसे हो सकता है कि उसे संवाद लांघ पाये? राजनीति फिर किस स्तर पर की जानी चाहिए, आम समझ के स्तर पर या गहन समझ के स्तर पर? या आम समझ के स्तर पर अलग और गहन समझ के स्तर पर अलग राजनीति होनी चाहिए, जो शायद इस दौर में हो भी रही है।

3/05/2016

मोदी की गोदी से उतरे, तो कन्हैया के आगे दंडवत?



स्मृति सिंह 
(स्मृति सिंह जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में शिक्षाशास्त्र की अंतिम वर्ष की शोध छात्रा हैं और फिलहाल मिशिगन यूनिवर्सिटी में फुलब्राइट स्कॉलर हैं. दिल्ली के एलएसआर कॉलेज और अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में इन्हें अध्यापन का भी अनुभव है. जेएनयू के प्रकरण पर कल इनकी लिखी एक टिप्पणी जनपथ पर प्रकाशित हुई थी. स्मृति ने इसी संदर्भ एक ताज़ा टिप्पणी लिख कर भेजी है जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है. जेएनयूएसयू के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के ज़मानत के बाद दिए भाषण पर यह प्रतिक्रिया अपने किस्म की है जो हमें सोचने पर मजबूर करती है - मॉडरेटर)  


3/04/2016

आपके पास अब आँखें चुराने का विकल्प नहीं है!



स्मृति सिंह 


मेरी माँ ने एक बार एक कहानी सुना कर मुझसे कहा था, "अहंकार खुद अपना काल पैदा कर लेता है!" इस बात को अब तक भी पूरी तरह गुन नहीं पायी हूँ क्योंकि बात की गहराई बढ़ती जाती है।


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