5/29/2016

GUJARAT FILES : सच, साहस और थोड़ी-सी विनम्रता का सत्‍ता-विमर्श



अभिषेक श्रीवास्‍तव 


राणा अयूब 


अपने मीडिया अंक के लिए अर्नब गोस्‍वामी से एक बार कारवां पत्रिका ने साक्षात्‍कार लेने की कोशिश की थी। उस वक्‍त अर्नब ने जो जवाब दिया था, वह अब तक याद रह गया- जर्नलिस्‍ट्स आर नॉट स्‍टोरीज़ यानी पत्रकार खुद ख़बर नहीं होते। अर्नब गोस्‍वामी की पत्रकारिता पर सवाल बेशक हो सकते हैं, लेकिन ऐसी निस्‍पृहता एक बुनियादी किस्‍म की ईमानदारी की मांग करती है जहां पत्रकार के लिए ख़बर से ज्‍यादा अहम कुछ नहीं है, अपनी जिंदगी भी नहीं। यह बात अलग है कि शनिवार की शाम इंडिया हेबिटैट सेंटर में पत्रकार राणा अयूब की किताब ''गुजरात फाइल्‍स'' का लोकार्पण अर्नब समेत किसी भी मीडिया संस्‍थान के लिए ख़बर नहीं बना।

5/20/2016

आज खुश तो बहुत होगे तुम...



प्रधानमंत्री के नाम एक भक्‍त का खुला पत्र 


व्‍यालोक 






आदरणीय प्रधानमंत्री
नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदीजी,

आज, खुश तो बहुत होंगे आप। आखिर, कांग्रेसमुक्त भारत का आपका सपना पूरा होने वाला जो लगता है। पांच राज्यों के आए चुनावी नतीजों ने कांग्रेस को और भी हाशिए पर धकेल दिया है। पूर्वोत्तर में आपका खाता खुल गया है, असम में पहली बार पूर्ण बहुमत से आपकी सरकार बनने वाली है। तो क्या हुआ, अगर इस जीत की अगुवाई एक पूर्व कांग्रेसी कर रहा है। तमिलनाडु और केरल में आपका कुछ भी दांव पर ही नहीं था, तो वहां कांग्रेस का बुरी तरह सफाया ही आपके लिए राहत की बात है।

5/15/2016

पल्‍लवी जोशी: तीस साल बाद एक नुक्‍़ते की खूबसूरत ख़तावार

अभिषेक श्रीवास्‍तव 



शायद तीस साल पहले पल्‍लवी जोशी से मेरा परिचय हुआ था। तब मैं छोटा बच्‍चा था और वे टीवी के सीरियलों में काम करती थीं। मुझे अच्‍छे से याद है कि दूरदर्शन पर आने वाले तमाम धारावाहिकों में अगर मैं किसी एक चेहरे को अच्‍छे से पहचानता था, तो वह उन्‍हीं का चेहरा था। शायद, वह बेदाग खूबसूरती रही होगी या कुछ और, लेकिन बड़ी होती उम्र में भी श्‍याम बेनेगल का 'भारत एक खोज' देखने की बड़ी वजह पल्‍लवी जोशी ही रहीं। ये बात अलग है कि 'भारत एक खोज' मिडिल स्‍कूल में उतना समझ में नहीं आता था, फिर भी मैं नियम से उसे देखता था।

5/04/2016

भाई राहुल पंडिता, आपका ध्‍यान किधर है? ''कुंठा की गिलहरी'' इधर है!


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


राहुल पंडिता दौड़ाक, साइकिल चालक के अलावा दक्ष गोताखोर भी हैं।  


दिल्‍ली आने के बाद अर्जित शुरुआती अनुभवों में एक अनुभव जो सबसे दिलचस्‍प रहा, वह था सड़क पर होने वाले झगड़ों-झंझटों और टकरावों का। मैं तकरीबन रोज़ ही ऐसे टकरावों का गवाह ब्‍लू लाइन या डीटीसी में बनता था। मसलन, धक्‍कामुक्‍की की किसी घटना या किसी की बाइक दूसरे की कार से छू जाने के बाद किन्‍हीं दो व्‍यक्तियों के बीच कहासुनी शुरू होती थी। ''मैं तेरे को देख लूंगा'', जैसे मशहूर वाक्‍यों को बार-बार दुहराया जाता। बीच-बीच में दिल्‍लीआइट गालियों का तड़का भी मारा जाता। हर वाक्‍य के बाद लगता कि दोनों में से कोई एक हाथ छोड़ देगा, लेकिन तमाशबीनों को निराशा हाथ लगती। बिलकुल मारपीट की कगार पर पहुंच कर विवाद थम जाता। ''चल, चल, बड़ा आया है...'' जैसे वाक्‍यों के बाद एकाध पलटा-पलटी होती, फिर भीड़ खत्‍म।

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