6/24/2016

दिल्‍ली-23 जून, 2016 : 'अपने जैसोंं' के गिरोह और उठ खड़े होने की एक अदद धुन


पहला प्रफुल्‍ल बिदवई स्‍मृति पुरस्‍कार, 23 जून 2016, दिल्‍ली 


दिल्‍ली मुझे पसंद है। इसलिए नहीं कि वह राहत देती है, इसलिए कि वह झकझोरती है। सोचने को मसाला देती है। दिमाग के पट पर दस्‍तक देती है। थोड़ा टेढ़ा होकर देखने की सहूलियत देती है। मैं अचानक यह बात क्‍यों कह रहा हूं? मेरे एक प्राचीन मित्र हैं जो आजकल पूर्वांचल पर केंद्रित एक टेबलॉयड निकाल रहे हैं। इसके पहले भी वे तमाम किस्‍म के पत्रकारीय/अलाइड धंधे शुरू कर के बंद कर चुके हैं लेकिन कभी उन पर लिखने का ऐसा मन नहीं बना। उन्‍होंने दरअसल कल यानी गुरुवार 23 जून को अपने अख़बार की ओर से एक भव्‍य आयोजन करवाया दिल्‍ली के श्रीराम सेंटर में, जिसमें दर्जन भर लोगों को सम्‍मानित किया गया, मालिनी अवस्‍थी का नाच-गाना हुआ और रात में भोजन भी हुआ। मैं वहां जिस माहौल से होकर पहुंचा था, वह भी एक सम्‍मान समारोह ही था लेकिन कतई अलहदा। शाम छह बजे कांस्टिट्यूशन क्‍लब में मरहूम पत्रकार प्रफुल्‍ल बिदवई की पहली बरसी पर उनकी स्‍मृति में एक पुरस्‍कार दिया जाना था और मीडिया के संकट पर परंजय गुहा ठाकुरता का व्‍याख्‍यान था। यहां अध्‍यक्षता इतिहासकार रोमिला थापर कर रही थीं जबकि पूर्वा सम्‍मान आयोजन की अध्‍यक्षता केंद्रीय मंत्री नोएडा वाले महेश शर्मा को करनी थी। कंट्रास्‍ट देखिए- वैचारिक भी दिखेगा, भाषायी भी दिखेगा, वर्गीय भी दिखेगा, और भी बाकी बहुत कुछ दिखेगा, जो अन्‍यथा न दिख पाता अगर मित्र अवतंस चित्रांश ने यह कार्यक्रम दिल्‍ली की जगह बनारस में रखा होता। यह संयोग ही रहा कि दोनों आयोजनों का समय भी आसपास था और आयोजन स्‍थल की दूरी भी, वरना कुछ बुनियादी चीज़ें वाकई मेरी समझ से बाहर रह जातीं।

6/20/2016

पिता पर एक लंबी कविता



मेरे भीतर दो पिता 


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


6/13/2016

जल्‍द आ रहा है केवल जनपथ पर...





समाजवादी पार्टी से राज्‍यसभा में गए ठाकुर अमर सिंह ने कहा है कि जवाहरबाग में नक्‍सली थे। क्‍या आप जानना चाहेंगे अमर सिंह के नक्‍सली कैसे दिखते हैं? मीडिया कह रहा है कि जवाहरबाग में रॉकेट लॉन्‍चर मिला। क्‍या आपको पता है कि बाग में हथियार के नाम पर क्‍या था? कुछ लोग रामवृक्ष यादव को सनकी बता रहे हैं। जेल में बंद एक सत्‍याग्रही औरत ने बच्‍चा जना तो उसका नाम रामवृक्ष रख दिया। इसका मतलब ये औरत भी सनकी है। इसकी तरह वे हजारों लोग भी सनकी थे जो जवाहरबाग में इकट्ठा थे। तो क्‍या इस देश में सनकी लोगों को जिंदा रहने का हक नहीं? उन्‍हें गोली से मार दिया जाएगा? आग में झोंक दिया जाएगा?  अस्‍पताल में हथकड़ी बांधकर रखा जाएगा? कौन है इस देश में असल सनकी? जो मरा या जिसने सनकी समझ कर इंसान को मारा? या फिर वो जो सनकियों की मौत को अपनी सनक लागू करने में भुना रहा है?  

सवाल कई हैं। सब अनसुलझे। चैनलों और अखबारों की भीड़ में एक रिपोर्ट ऐसी नहीं है जो जवाहरबाग का सच्‍चा चेहरा दिखा सके। जानना है कि 2 जून, 2016 को जवाहरबाग में क्‍या हुआ? देखते रहिए जनपथ... 

मथुरा के जवाहरबाग की सच्‍ची कहानी, प्रत्‍यक्षदर्शियों की जुबानी, अनकट... 

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