6/20/2016

पिता पर एक लंबी कविता



मेरे भीतर दो पिता 


अभिषेक श्रीवास्‍तव 




पिता बनना इतना मुश्किल होगा
मैंने सोचा भी न था
मां कहती थी बचपन में
जब बाप बनोगे तब पता चलेगा
क्‍या पता चलेगा?
जो बिना बाप बने ही आ चुका है समझ में
सिवाय इसके
कि पिता बनना एक मुश्किल काम है
बेहद मुश्किल
पिता होते तो भी क्‍या फ़र्क पड़ जाता
संभव है वे केवल होते
और पिता बनने की कोशिश करते
अपनी मां के कहे मुताबिक
और करते महसूस धीरे-धीरे
कि पिता बनना कितना मुश्किल होता है।  

वे होते
तो शायद क्‍या, पक्‍का ही
मैं बाप बनने से कर देता इनकार
पत्‍नी की जि़च के बावजूद
वे नहीं हैं
तो मन में है एक छवि-सी
कि पिता ऐसे होने चाहिए
पिता वैसे होने चाहिए
देखता हूं रोज़ गली में बच्‍चों को गोद में उठाए
टहलाते
तमाम पुरुषों को
सोचता हूं
क्‍या वे भी मेरी तरह सोचते होंगे?
कि वे जो हैं, वह होना कितना मुश्किल है
फिर खयाल आता है
ऐसे ही होते होंगे सारे बाप
मेरे भी ऐसे ही रहे होंगे
टहलाते, घुमाते, पान खाते
फिर मैं क्‍यों लेता हूं तनाव इतना?
चाहता हूं बनना वो
जो न मैंने देखा, न जाना?

ज़रूरी नहीं कि हर बाप हो पिता सरीखा
मां भी तो कहती थी
जब बाप बनोगे तब पता चलेगा
मतलब, उसे भी बाप का ही अनुभव होगा
बच्‍चों को अपने बाप पिता नहीं लगते
तो उसमें उनका क्‍या दोष?
मांओं को अपने पति अपने बच्‍चों के पिता नहीं लगते
तो उसमें उनका क्‍या दोष?
बाप बनना
पिता बनना नहीं है
आजकल यही बात मैं कह रहा हूं अपने घर में
जिसे सुनने को कोई तैयार नहीं।

मैंने अगर आकांक्षा की थी एक पिता की
तो बदले में मैं सिर्फ एक पिता ही बन सकता हूं
उससे कम कुछ नहीं मुझे मंजूर
यह जानते हुए भी, कि
पिता बनना एक मुश्किल काम है
बेहद मुश्किल
लेकिन घर की औरतें ज्‍यादा समझदार हैं
जो कहती हैं
पहले बाप बनकर तो दिखाओ
फिर जो करना हो कर लेना
जैसे पालना हो वैसे पाल लेना
अपनी संतान को
क्‍या इतना ही आसान है ये सब कुछ?
बाप बन जाने के बाद पिता बनने की गुंजाइश
कितनी बच जाती होगी?
मेरे बाप होते तो पूछ भी लेता
दूसरों के पिताओं को देखकर होता है रश्‍क़
और एक संदेह भी
कि वे कितने पिता होंगे और कितने बाप
मैंने पूछा और
कहीं वे हंस दिए तो?

अपने पिता से मुझे नहीं है कोई शिकायत
वहीं से मिलता है बल मुझे पिता बनने का
बाप की नामौजूदगी में बिलकुल है मुमकिन
पिता को पा लेना, ठीक वैसे ही
जैसे ज़रूरी नहीं कि पिता बनने के लिए
बना जाए बाप!

आजकल मेरे भीतर है
दो पिताओं का वास
एक, मेरे पिता
दूसरा, खुद मैं,
बनता हुआ अपने पिता के जैसा।  
किसी अंतरंग क्षण में
जब घर में औरतें नहीं होतीं
मैं, मेरे पिता और मेरे भीतर बैठा पिता
तीनों करते हैं बातें
आने वाली संततियों की
मेरा डर
पहली बार खुलता है अपने पिता के समक्ष
जब पूछता हूं उनसे-  
पिता, जैसे तुम गए,
क्‍या मैं भी बच जाऊंगा केवल कविताओं में
अपनी संतानों के?
सिर्फ इसलिए कि मुझे
बाप बनना था नामंजूर?

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