7/21/2016

हाशिम अंसारी होने का मतलब


शाह आलम



''जब मैंने सुलह की पैरवी की थी तब हिन्दू महासभा सुप्रीम कोर्ट चली गई। महंत ज्ञानदास ने पूरी कोशिश की थी कि हम हिंदुओं और मुस्लिमों को इकट्ठा करके मामले को सुलझाएं, लेकिन अब मुकदमे का फैसला कयामत तक नहीं हो सकता है। इस मुद्दे को लेकर सभी नेता अपनी रोटियां सेक रहे हैं....बहुत हो गया अब''।  


7/05/2016

ऑपरेशन जवाहरबाग: कचहरी में भटकता एक काला कोट


रामवृक्ष यादव के वकील तरणी कुमार गौतम 

अगर कोई एक शख्‍स 2 जून की घटना के बाद साहस और सरोकार के साथ धारा के खिलाफ तैर रहा है तो वह है रामवृक्ष का वकील तरणी कुमार गौतम, जिसे यह भी पता नहीं है कि उसका क्‍लाइंट जिंदा है या मर गया। 11 जून की सुबह मुलाकात करने का वादा कर के गौतम बाद में तीन बार फोन नहीं उठाते और आधा घंटा अपने चैंबर नंबर 21 में इंतज़ार करवाने के बाद अचानक पसीना पोंछते हुए प्रकट होते हैं। दो और व्‍यक्ति जो काफी देर से उनका इंतज़ार कर रहे थे, उन्‍हें देखते ही खड़े हो जाते हैं। पहला व्‍यक्ति कुछ शिकायती लहजे में मुंह बनाता है तो वे जवाब देते हें, ''तुम्‍हारी ही तारीख लेने गया था.. कोर्ट से आ रहा हूं। सारा काम निपटा दिया।'' वे उसे एक काग़ज़ पकड़ाते हैं और बदले में वह व्‍यक्ति उन्‍हें 100 रुपये का नोट थमाता है। उसके चले जाने के बाद वे हमारी ओर मुड़ते हैं।

7/03/2016

ऑपरेशन जवाहरबाग : फरियादोंं की फेहरिस्‍त पर बैठा और ऐंठा शासन


अभिषेक श्रीवास्‍तव 


कोई चार दिन हुए होंगे जब मेरे पास मथुरा से एक फोन आया। नंबर अनजान था। उधर से आवाज़ आई, ''साहेब, आपक नंबर हमै वकील साहब दिये रहिन... हम जगदीश बोल रहे हैं।'' बातचीत के बीच-बीच में उसकी आवाज़ कमज़ोर पड़ रही थी तो कभी अचानक तेज़ हो जा रही थी। आज उसकी एक तस्‍वीर मुझे मिली, तो इसका राज़ समझ में आया। जगदीश के दोनों हाथ पुलिस ने तोड़ दिए हैं। वह अपने हाथ से पानी भी नहीं पी सकता। ज़ाहिर है, उस दिन वह फोन पर बात कर रहा था तो मोबाइल किसी और ने पकड़ रखा था, जिसके रह-रह कर हिलने से आवाज़ खराब हो जा रही थी।

जगदीश, पुत्र परागलाल, नि. कैसरगंज, बहराइच 

7/02/2016

ऑपरेशन जवाहरबाग : भरोसे की बरसी, रामभरोसे की मौत



अभिषेक श्रीवास्‍तव 





ठीक महीने भर पहले सैकड़ों लोगों के एक भरोसे की मौत हुई थी। कल रात रामभरोसे की भी मौत हो गई। इस बीच मथुरा में जाने कितनी मौतें हुई होंगी और आगे जाने कितनी और होंगी, लेकिन जवाहरबाग की कहानी अब हमारे ज़ेहन का हिस्‍सा नहीं है। ये दौर ही ऐसा है जब बड़ी से बड़ी कहानी की उम्र हफ्ते भर से ज्‍यादा नहीं होती, लेकिन मथुरा वाले जानते हैं कि जवाहरबाग में 2 जून, 2016 की शाम जो घटा था, उसकी उम्र काफी लंबी है। अरसा हुआ यह देखे हुए कि कोई अख़बार पूरे एक महीने तक किसी घटना को विशेष कवरेज देता रहे और उसे ख़बरों की कमी न पड़े। मथुरा का जवाहरबाग अगर आज भी ''ऑपरेशन जवाहरबाग'' के नाम से अमर उजाला के दूसरे पन्‍ने पर लगातार जगह पा रहा है, तो यह बात नज़रअंदाज़ करने योग्‍य कतई नहीं है।

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