7/21/2016

हाशिम अंसारी होने का मतलब


शाह आलम



''जब मैंने सुलह की पैरवी की थी तब हिन्दू महासभा सुप्रीम कोर्ट चली गई। महंत ज्ञानदास ने पूरी कोशिश की थी कि हम हिंदुओं और मुस्लिमों को इकट्ठा करके मामले को सुलझाएं, लेकिन अब मुकदमे का फैसला कयामत तक नहीं हो सकता है। इस मुद्दे को लेकर सभी नेता अपनी रोटियां सेक रहे हैं....बहुत हो गया अब''।  



यह कहते हुए रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मुकदमे के मूल मुद्दई और बाबरी मस्जिद के पैरोकार हाशिम अंसारी ने आगे मुकदमे की पैरवी करने से मना कर दिया था। इस इनकार और मुकदमे के सुलझने के नाकाम इंतज़ार में जो दर्द बयां हुआ है, वह हाशिम अंसारी की उस समृद्ध विरासत से आता है जो उनके पिता और दादा छोड़ गए हैं। हाशिम अंसारी के इस बयान और दिल पर पत्थर रखकर किए गए इस कड़े फैसले की अहमियत को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उनके दिलो दिमाग को एक बार जान सकें जिसमें गंगा-जमुनी तहजीब की आनुवंशिक रवायत पैबस्त है। 

अयोध्या के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक कनक भवन है। इसका निर्माण टीकमगढ़ रियासत की महारानी ने करवाया था। इसी कनक भवन में हाशिम अंसारी के दादा सिपाही थे जो सामान्य दिनों से लेकर मेलों और मंदिरों के तमाम उत्सवों तक न सिर्फ मंदिर की देखभाल करते थे बल्कि पूरी जिम्मेदारी भी निभाते थे। कनक भवन से सटे एक मंदिर में अंसार हुसैन उर्फ चुन्ने मियां 45 साल तक मैनेजर रहे। मेले के दिनों में वे बछिया के गोदान की परंपरागत रस्म को भी निभाने का काम करते थे। एक मुसलमान होने के बावजूद उनके द्वारा निभाई जाने वाली इस रवायत पर यहां कभी किसी ने एतराज नहीं जताया।वैसे हाशिम के पिता ने उनके दादा से अलग हट कर सिलाई का पेशा चुना। हाशिम अंसारी ने भी अपनी जीविका के लिए यह काम कई साल तक किया। 

मेहनताना में मिलता था मंदिरों का प्रसाद

अयोध्या के मुख्य बाजार श्रृंगार हाट में उनकी सिलाई की दुकान थी। अपने पिता की तरह ही हाशिम ने सिलाई को रोजी-रोटी का जरिया बनाया। कपड़ों की सिलाई के मामले में वे कुशल कारीगर माने जाते थे। कभी हाशिम के हाथों ही अयोध्या के मंदिरो में भगवान के कपड़े सिले जाते थे। इसके एवज में उन्हें मंदिरों में चढ़ा हुआ प्रसाद लड्डू मिलता था, पैसे नहीं। हाशिम ने कभी इस काम के लिए पैसों की मांग भी नहीं की। मेलों-त्योहारों पर मंदिरों के पुजारी भगवान के लिए नए वस्त्र सिलाने के लिए हाशिम के पास आते तो वे बड़े अदब से खुशी-खुशी कपड़े सिल दिया करते थे। उस दौर के अयोध्या में कई तरह के रिवाज और परम्पराएं कायम थीं। जैसे भगवान के कपड़ों की सिलाई के बदले मंदिरों का प्रसाद पारिश्रमिक के रूप में मिलता था। ठीक वैसे ही साधुओं का बाल काटने का काम करने वाले मुस्लिम नाई को पैसे की जगह मंदिरों का यही प्रसाद दिया जाता था।

जब इतिहास में शुरू हुई हलचल 

22-23 दिसम्बर 1949 की दरम्यानी रात बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखे जाने का विरोध हुआ। उस विरोध कार्यक्रम में खुफिया पुलिस ने हाशिम का नाम भी तकरीर करने वालों में जोड़ दिया। फिर क्या था, अधिकारी के पास पेशी हुई तो उसने हाशिम से पूछा कि क्या काम करते हो? तो उन्होंने कहा कि, 'साहब मैं दर्जी का काम करता हूं'। अधिकारी ने कहा कि दर्जी ऐसा काम नहीं कर सकता। इसलिए इनका नाम सूची से काट दिया गया। इस घटना के बाद उन्होंने मजबूरन सिलाई करना छोड़ दिया। 

धर्म के नाम पर नहीं जुटाया चंदा

हमेशा सुर्खियों में बना रहने वाला यह शख्स अयोध्या रेलवे स्टेशन के नजदीक मोहल्ला कुटिया में एक साधारण घर में परिवार के साथ रहता था। हाशिम का एक बेटा है जिसकी ड्राइवरी से घर का खर्च चलता है। हाशिम इसी हालात में 60 सालों से भी अधिक समय से बाबरी मस्जिद के मुकदमे की पैरवी करते रहे, लेकिन कभी भी उन्होंने मस्जिद के नाम पर न तो कोई चंदा इकट्ठा किया और न ही अपनी सादगी बदली। चाहते तो मंस्जिद के नाम पर करोड़ों का चंदा इकट्ठा कर सकते थे लेकिन उनका ज़मीर इस काम के लिए तैयार नहीं था। यह फक्कड़ आदमी अयोध्या नगरी की तासीर था जो हमेशा एक लुंगी कमीज या कुर्ते में ही दिखा। 

मंदिर मस्जिद के नाम पर सियासतदानों का कारोबार खूब फला-फूला। अयोध्या के नाम पर दुकान चमकाने वाले मुसीबत के वक्त किनारा कर लेंगे, ऐसा किसी ने सोचा नहीं था। जुलाई 2014 के प्रथम सप्ताह में हाशिम अंसारी की तबियत अचानक बिगड़ने पर परिवार ने पास के श्रीराम चिकित्सालय में उन्हें  भर्ती कराया। यहां के चिकित्सकों ने ऑपरेशन के लिए गंभीर हालत में उन्हें किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय, लखनऊ भेज दिया, लेकिन तय समय पर ऑपरेशन इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि परिवार के पास पैसे नहीं थे। हालांकि बाद में परिवार ने किसी तरह से पचास हजार रुपए जुटा कर हाशिम का ऑपरेशन कराया। बाबरी मस्जिद/ रामजन्म भूमि विवाद को कोर्ट से बाहर सुलझाने को लेकर उन्होंने अयोध्या के प्रमुख महंतों के साथ कई बार कोशिश की। इस आदमी के ईमानदारी से किए गए शांति प्रयासों की वजह से ही कोई भी आदमी जब घर के सामने से गुजरता है तो इनके सम्मान में नमस्ते कहते हुए बड़े अदब से अपना सिर झुका देता है।

हाशिम अंसारी जैसे नेकदिल इंसान को मीडिया ने देश के सबसे बड़े विवाद का चेहरा भले ही बना दिया हो, लेकिन अयोध्या की धूनी रंगत में हाशिम साहब को चाहने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। मरहूम हाशिम के प्रति लोगों के दिलों में प्यार का ही नतीजा था कि उनके जीते जी उन्हें बीड़ी और चाय पिलाने वालों की कभी कमी नहीं रही। यहां की फिजा में और लोगों के जे़हन में लम्बे वक्त से बसा यह शख्स भले ही दूसरी दुनिया में चला गया हो लेकिन उसकी खूबियां और विरासत आने वाली पीढ़ियों के रास्तों को रौशन करती रहेंगी।

अफसोस कि बीते कई बरसों से हर साल 6 दिसंबर को अयोध्या में मनाए जाने वाले यौमे ग़म यानी शोक दिवस में यह शख्‍स अब कभी नहीं रहेगा। हाशिम अंसारी की मौत के साथ बाबरी मस्जिद की लड़ाई के इतिहास का एक चक्र भी पूरा हो गया।

(शाह आलम दस्तावेज़ी पत्रकार, फिल्मकार और यायावर हैं. आजकल चम्बल के बीहड़ों की ख़ाक साइकिल से छान रहे हैं) 

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