8/04/2016

ये शहर आब को तरसेगा चश्‍म-ए-तर के बगैर...


बनारस: सावन, 2016 


अभिषेक श्रीवास्‍तव 





एक 

ये कहानी सावन की है। सावन, जो बीते कुछ वर्षों में पहली बार ऐसे आया है गोया वाकई पहली बार ही आया हो। वरना हर बार सावन बीत जाता था और मन सूखा रह जाता था। इस बार चहुंओर बरसा है। ठीकठाक बरसा है। इस बारिश का ही जादू था, रामजी यादव के न्‍योते का कम, कि हम बीते शनिवार झोला उठाकर कांवडि़यों की भीड़ को चीरते हुए काशी विश्‍वनाथ से खरामा-खरामा बनारस पहुंच गए।



ये कहानी सावन की है, लेकिन शुरू होती है कांवडि़यों से और खत्‍म भी होती है कांवडि़यों पर। कांवडि़ये, जिनके डीजे से दिल्‍ली का एनएच-24 दहल उठता है। जिनके हाथों में कांवड़ के साथ अबकी पहली बार तिरंगा लहरा रहा है। ये तो सबने देखा है। कुछ ने तो लिखा भी है कांवडि़यों के इस राष्‍ट्रवाद पर। यह राष्‍ट्रवाद दिल्‍ली से तिरंगे की शक्‍ल में निकलता है और बनारस पहुंचते-पहुंचते इसका रंग भगवा हो जाता है। बाबा विश्‍वनाथ के लिंग पर जल चढ़ाकर दिल्‍ली लौट रहे नांगलोई के झाजी इस बात से कुपित थे कि कुछ नौजवान बम मंड़ुवाडीह स्‍टेशन पर भारतीय जनता पार्टी का झंडा क्‍यों लहरा रहे थे। वे बोले, ''बताइए, धार्मिक आयोजन को किसी पार्टी से जोड़ने का क्‍या मतलब?''

उनका सवाल जायज़ था, लेकिन देर से उठा था। हो सकता है इससे पहले उन्‍होंने यह सवाल जान-बूझ कर नहीं उठाया हो, वरना बनारस के मैदागिन चौराहे पर जड़ी विश्‍व हिंदू परिषद की फुल साइज़ होर्डिंग किसी की नज़र से बच जाए, उसे इसके लिए नहीं लगाया गया है। कांवडि़यों का धार्मिक-राजनीतिक समूहों द्वारा स्‍वागत किया जाना एक बात है। बनारस में जलाभिषेक के पूरे आयोजन का प्रबंधन अगर विश्‍व हिंदू परिषद ही कर रहा हो, तो इस पर सवाल बनता है। यह सवाल लेकिन पूछेगा कौन?

झीनी-झीनी बारिश में मैदागिन से गोदौलिया तक सड़क के किनारे लगी बांस की बल्लियों के भीतर पंक्तिबद्ध खड़े शिवभक्‍तों का इकलौता सहारा विश्‍व हिंदू परिषद का पंडाल है। रह-रह कर लाउडस्‍पीकर से आवाज़ें आ रही हैं। किसी का लड़का गायब है। किसी का पति गायब है। किसी की बहन नहीं मिल रही। सबका नाम और गांव पुकारकर गुज़ारिश की जा रही है कि वे विश्‍व हिंदू परिषद के पंडाल पर पहुंचें। सैकड़ों की संख्‍या में तैनात पुलिसबल और सीआरपीएफ की कोई प्रत्‍यक्ष भूमिका नहीं दिख रही। सावन के सोमवार को बनारस में दो किस्‍म के समानांतर प्रशासन चल रहे हैं। किसी को दूसरे से दिक्‍कत नहीं है। हर सोमवार स्‍कूल बंद रखे जा रहे हैं। इससे भी किसी को कोई दिक्‍कत नहीं है।

बात केवल कांवडि़यों की होती, तो समझने की कोशिश की जाती। संकटमोचन के पास साकेत नगर कॉलोनी में एक मंदिर के बाहर कुछ औरतें बैठ कर कीर्तन कर रही हैं। वहां भी विश्‍व हिंदू परिषद का झंडा लगा है और हिंदू नव वर्ष की बधाई देता एक पोस्‍टर टंगा है। ये अचानक ऐसा क्‍या हुआ है कि बनारस में एक खास संगठन कुछ ज्‍यादा दिखाई देने लगा है?

यह बात शायद समझ में नहीं आती अगर राणा अयूब की ''गुजरात फाइल्‍स'' पढ़ते वक्‍त मैंने जानने की कोशिश न की होती कि आखिर उस किताब में गुजरात के भीतर आरएसएस के कार्यकलापों का जि़क्र क्‍यों नहीं है। जो लोग गुजरात से इधर के वर्षों में परिचित रहे हैं, वे बताते हैं कि गुजरात में आरएसएस का ज़मीनी काम पूरा हो चुका और वहां दक्षिणपंथी राजनीति की पहचान विश्‍व हिंदू परिषद से ही होती है। इसीलिए राणा अयूब के अनुभवों में परिषद का जि़क्र बार-बार आता है, आरएसएस का कहीं नहीं।
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दो 

आरएसएस का काम पूरा होने का मतलब क्‍या है?

राजघाट पर एक त्रिपाठीजी रहते हैं जो पेशे से कारोबारी हैं और विशुद्ध बनारसी हैं। ट्रेन में मिले तो मिलते ही घुलमिल गए। पहले अपने बारे में बताया, अपने बच्‍चों के बारे में बताया, अपने संपर्कों के बारे में बताया, शहर की मशहूर कचौड़ी-जलेबी और खीरमोहन की दुकानों पर चर्चा हुई और थोड़ी देर बाद इस देश के एक औसत आदर्श नागरिक की तरह वे राजनीति पर आ गए। बनारस के राजनीतिक विमर्श में बॉटमलाइन सबसे पहले बोली जाती है, बाद में उसकी दाएं-बाएं से व्‍याख्‍या की जाती है। त्रिपाठीजी ने इसी प्राचीन परंपरा का पालन करते हुए सीधे कहा, ''नाथूरमवा ठीक किए रहा गांधी को गोली मारकर...।'' क्‍यों?

''आप तो पढ़े-लिखे हैं। इतिहास जानते होंगे। जब आजादी की पहली लड़ाई हुई रही...।''

''1857 वाली?''

''अरे नाहीं यार... मंगल पांडे से भी पहिले...। ई पहिले विश्‍व युद्ध के आसपास क बात हव...।''

''पहला विश्‍व युद्ध तो काफी बाद में हुआ...। मंगल पांडे तो बरसों पहले हुए...।''

''हां, वही के आसपास... मतलब बात समझ रहे हैं न? उस टाइम एगो खलीफा रहा सब मुसलमान देश का... जो यूरोप में थे।''

''मुसलमान देश यूरोप में? किसकी बात कर रहे हैं त्रिपाठीजी?''

बनारस के आदमी को जब गुस्‍सा आता है तो वह 'तुम' मिश्रित विशुद्ध खड़ी बोली बोलने लगता है। सो, त्रिपाठीजी खीझ कर बोले- ''अरे यार, तुम इतिहास पढ़ो। बात को समझो। पहिले ये सब एशिया-वेशिया यूरोप में रहा। यूरेशिया का नाम सुने हो?''

''जी, आगे बढि़ए...।''

''तो अंग्रेजवन सब खलीफा को हटा दिए।''

''कइसे?''

''अरे यार, दुनिया पर अंग्रेजों का राज था न?''

''ओके...।''

''इसी के बाद से गुरु सब मुसलमान आजादी के लड़ाई में हिस्‍सा लेना बंद कर दिए। नाहीं त बतावा... नेहरूवा एतना लम्बा रहे, एगो लाठी पड़त त दोहरा हो जात... अ गांधीजी? सरऊवाले लंघटे घुम्‍मत रहलन, डेढ़ पसली क रहलन, एक ठे लाठी पड़त त सोच ला का होत। लेकिन ये सब गद्दार निकले... लाठी खाई जनता... गरम दल वाले। आजादी के बाद ई सब आकर कब्‍जा कर लिए। अरे बहुत दोगला रहलन सब...।''

''आपका अध्‍ययन तो बहुत तगड़ा है त्रिपाठीजी। कहां पढ़े हैं ये सब?''

(थोड़ा लजाते हुए) ''मेरे पिताजी साहित्‍यकार थे न... उन्‍हीं का असर खून में है।''

''ये सब पढ़ने को कहां मिलेगा? किस किताब में?''

''ई कई किताबन क निचोड़ हव। भारतीय स्‍वयंसेवक संघ वाले  बहुत शोध कइले हउवन ए विषय पर...।''

''भारतीय कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ?''

''अरे यार, समझ गइला न? उ जवन हाफ पैंट पहिनेलन सब? स्‍वयंसेवके न कहलानSSS? एक मिला हव हमरे कालोनी में। तन्‍नी सी टेढ़ बोलदा त भड़क जाला सरवा। बतिया त ठीके कहेलन सब। अरे, हम आपन मल्‍टीमीडिया मोबाइल घर छोड़ आयल हईं नाहीं त तोहके देखाइत पूरा कहानी... ।"

''कैसी कहानी... ?''

''वही, खलीफा वाली। वाट्सएप पर आयल रहे।''

''के भेजले रहे?''

''इतिहासकारे हव... बड़ा इतिहासकार विद्वान आदमी... जानीला...।''
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तीन

त्रिपाठीजी का शिक्षण पूरा हो चुका है। वे आरएसएस का पूरा नाम नहीं जानते, लेकिन उसकी सिखाई कहानी को कंठस्‍थ कर चुके हैं। त्रिपाठीजी अकेले नहीं हैं। अर्दली बाजार के अवस्‍थीजी भी उनके जोड़ीदार हैं। बात आई कि दाल 200 के पार हो गई है लेकिन कोई हल्‍ला नहीं मचा रहा जबकि 70 रुपये पर कितना विरोध हुआ था। अवस्‍थीजी बोले, ''उस समय बाबा रामदेव की दाल नहीं थी न? पतंजलि वाली दाल खाया करिए। सस्‍ती भी है और मन को शांत भी करेगी।'' दाल मन को कैसे शांत कर सकती है? अवस्‍थीजी भड़क जाते हैं, ''तुम लोग सवाल बहुत करते हो। मोदीजी ठीक किए हैं तुम लोगों पर बैन लगाकर...।''

''कैसा बैन?''

''अरे कइसन पत्रकार हउवा? तुम्ही लोग तो आतंकवादी को शहीद दिखाते थे। मोदीजी ने कह दिया अब आतंकवादी का नाम-गांव नहीं दिया जाएगा, फोटो नहीं दिखाया जाएगा...।''

''कब लगा है ये बैन?''

''अरे भाई, फ्रांस में जो आतंकवादी हमला हुआ रहा, उसके बाद वहां के पत्रकार लोग तय किए कि अब आतंकवादी का फोटो-वोटो नहीं दिखाना है। मोदीजी सब देश में जा-जाकर घूम रहे हैं। फ्रांस के सम्‍मान में मोदीजी भी आदेश पारित किए कि यहां के आतंकवादी का डीटेल नहीं छापना है। पहिलवां तू लोग आतंकवादी के शहीद बतावत रहला... अब ला। थोड़ा कड़ाई तो जरूरी है। मीडिया खुदै आतंकवादी हो गया है आजकल... मने तोहके ना कहत हई... हहह...।''

''दिल्‍ली में तो कोई बैन की बात नहीं सुने हम?''

''कह तो रहा हूं, आप लोगों पर ये लागू नहीं है। कश्‍मीर में है। वहां क सब अखबारन पे छापा पड़ल रहे न... मोदी जी टाइट कर दिए हैं अबकी... अपनी सरकार होने का यही फायदा होता है।''

''ई सब कहां से देखे सुने महराज?''

''तोहरे टीविया में... ज़ी न्‍यूज़ नाहीं देखेला का? आप ही लोग दिखाते हैं, हम कोई कहानी थोड़े कह रहे हैं।''   

''और बताइए, बनारस का क्‍या हालचाल?''

''तू बतावा... तू त पत्रकार हउवा, घुम्‍मत हउवा दू दिन से...।''

''क्‍या बताएं... जगह-जगह सड़क पर गड्ढा है और गड्ढे में पानी है।''

''हत मर्दवा... पचास साल पुराना गड्ढा भरे में समय न लगी? आदमी काम कर रहा है। उसे समय दीजिए... सब ठीक कर देगा। आप भी कैसी बात करते हैं पत्रकार होके... बस एक राउंड और चाहिए...।'' 

''क्‍या एक राउंड?''

''आप 1989 में केतने बड़े थे? आपको याद नहीं होगा। दंगा हुआ रहा न... बड़ी मार मराए थे मिंयवा सब। उसके पहिले बनारस के मुसलमान बहुत बदमास रहे। एतना सही ठोका गया उस टाइम कि अभी तक सब शांत हैं। अब देख रहे हैं कि दोबारा हल्‍ला मचा रहे हैं सब...।''

''तो क्‍या करेंगे?''

''हम का करब? अंबेडकर कुल कर गइलन अपने मन्‍ने। आजादी के टाइम ही इन सबको वोट का अधिकार नहीं दिया गया होता तो आज देश का ये हाल नहीं होता। हम लोग का सविधान ही ब्‍लंडर है। पाकिस्‍तान तो बनाया गया था, क्‍यों नहीं गए सब वहां?"

बगल में बैठे ओझाजी पान से भरा कल्‍ला सेट करते हुए मुस्‍कराए और बोले, ''हमके त बड़ी चिंता होला भाय पाकिस्‍तान क? उनहने क दू ठे समस्‍या कोई हल कर देवे बस...।''

अवस्‍थीजी ने प्रश्‍नवाचक मुद्रा में निगाह ऊंची की। ओझाजी कल्‍ले में पान बाएं सेट करते हुए हंसे और बोले, ''पहली समस्‍या त यही हव कि कइसे दू से चार, चार से आठ, आठ से बारह पैदा कइल जाए...। दूसरी इ हव कि एतना पैदा हो गइलन, अब कइसे इनहन के सेट कइल जाए।''

कमरा समवेत् स्‍वर में ठहाकों से भर गया।
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चार 

ऐसा नहीं है कि सारे सवर्ण एक ही भाषा में बोल रहे हैं, हां इतना ज़रूर है कि भाषा सुनकर आप सामने वाले की जाति का पता साफ़ लगा सकते हैं। आज बनारस में केवल एक सवाल सामने वाले की जाति का पता लगाने का सटीक औज़ार है, ''अबकी बार, किसकी सरकार?"

अगर जवाब भाजपा है, तो मानिए कि सामने वाला ब्राह्मण, राजपूत, लाला-बनिया या किसी पिछड़ी जाति से हो सकता है। अगर जवाब समाजवादी पार्टी है, तो जवाब देने वाला यादव होगा या ज्‍यादा से ज्‍यादा भूमिहार, जिनकी संख्‍या बनारस में पर्याप्‍त है। जवाब में बसपा सुनने में नहीं आ रहा। मुसहर, भर और दलित भी बसपा का नाम नहीं ले रहे। तीन महीने पहले ऐसा नहीं था। लोगों का मानना है कि दयाशंकर सिंह वाले प्रकरण ने पलटकर बसपा को नुकसान पहुंचा दिया है।

दुर्गाकुंड के पीछे वाले इलाके में बसी दलित पट्टी का भगवाकरण जो 2014 के लोकसभा चुनावों के वक्‍त शुरू हुआ था, अब पूरा हो चुका है। यहां की झुग्गियों के कुछ रहवासी आज बाकायदा श्रीश्री रविशंकर के कार्यकर्ता हैं। पटेल समुदाय के भीतर अनुप्रिया पटेल को लेकर भारी नाराज़गी है। एक स्‍थानीय अखबार के संपादक जो पटेल जाति से आते हैं, गुस्‍से में कहते हैं कि अगर इस बार अनुप्रिया की मां चुनाव में खड़ी हो गईं, तो अनुप्रिया का पत्‍ता अगली बार साफ़ होना तय है। दरअसल, कुछ लोगों की निजी कारणों से नाराज़गी भी ऐसे बयानों का बायस बनती है। केंद्र में मंत्री बनने के बाद अनुप्रिया पटेल तक पहुंचना अब पहले के मुकाबले मुश्किल हो गया है। इस वजह से उनके कार्यकर्ताओं और समर्थकों में विशेष नाराज़गी है।

कांग्रेस के बारे में लोगों की राय सकारात्‍मक है, कि पार्टी सोते से जाग उठी है। मंगलवार की रैली इसका गवाह रही। शहर भर में इस रैली की सूचना देते हुए होर्डिंगें लगी थीं जिन पर एक ही नारा लिखा था, ''अबकी बार, सबकी सरकार''। नारा आकर्षक था, लेकिन होर्डिंगों पर दिख रहे नेताओं के चेहरों में ही ''सबकी'' वाला भाव नहीं आ रहा था। अधिकतर पर राजेश मिश्र और राजेशपति त्रिपाठी का चेहरा था, अजय राय बमुश्किल ही दिख रहे थे। इन तीनों नेताओं का आपसी मतभेद किसी से छुपा नहीं है।  

चुनावी चर्चा में अपनी पसंद की पार्टी को संभावित विजेता बताना एक अलग बात है, लेकिन उस पार्टी के मूल्‍यों से ताल्‍लुक रखना दूसरी बात है। काशी विद्यापीठ के एक पूर्व प्राचार्य जो जाति से दलित हैं, बसपा में उम्‍मीद देखते हैं लेकिन दयाशंकर सिंह के बयान से उन्‍हें कोई तक़लीफ़ नहीं है। वे कहते हैं, ''क्‍या गलत कहा उसने? टिकट का रेट लगाने की ही तो बात कही थी... दुनिया जानती है।''

दिल्‍ली में बैठकर जिन घटनाओं पर सामान्‍यत: मूल्‍य आधारित स्‍टैंड लिया जाता है, उन पर बनारस में खुलकर बात होती है फिर चाहे निष्‍कर्ष मूल्‍यों की धज्जियां उड़ाने तक ही क्‍यों न चले जाएं। विद्यापीठ के मैदान में बारिश के बाद टटकी सुबह एक सिंदूरधारी और जींसधारी महिला को देखकर वहां जॉगिंग करता एक कारोबारी अपने साथी से कहता है, ''अब बतावा... मुलायम सिंह का गलत कहले रहलन कि लड़के हैं, गलती हो जाती है?" यह व्‍यक्ति समाजवादी पार्टी का समर्थक नहीं है, घोर विरोधी है लेकिन बलात्‍कार पर मुलायम सिंह के कुख्‍यात बयान से इत्‍तेफ़ाक रखता है। उसे वह बयान ''कंसेप्‍चुअली'' सही जान पड़ता है।

बनारस के कुछ पुराने और ज़हीन बाशिंदों की सोच में भी इधर बीच फ़र्क आया है। भ्रष्‍टाचार अब उनके लिए मुद्दा नहीं रहा, तो सेकुलर ताने-बाने का सवाल संख्‍या का मामला हो चुका है। ऐसे ही एक शख्‍स मिश्राजी जो आजीवन कांग्रेस के समर्थक रहे और पिछले लोकसभा चुनाव में जिन्‍होंने आम आदमी पार्टी को वोट दिया, मौज लेते हुए अपनी आपबीती सुनाते हैं कि कैसे बिजलीवाले ने उन्‍हें दो बार ठग लिया। वे बताते हैं कि बिजलीवाला उनके यहां मीटर लगाने आया था। उसने प्रलोभन दिया कि तीन हजार रुपये में वह मीटर को ऐसा कर देगा कि बिजली का बिल कम आएगा। वे फंस गए। ''मैंने सोचा कि वो दस यूनिट को पांच या छह यूनिट तक ला देगा, उस साले ने आधा यूनिट कर दिया।''

जब बिजली का बिल जमा करने का कैम्‍प लगा, तब खेल बिगड़ गया। मिश्राजी बिल जमा कराने गए तो गर्मी के महीने में दो माह का 19 यूनिट देखकर बिजलीवाले का दिमाग ठनका और उसने जांच करने की बात कही। मिश्राजी अपना बिल लेकर हांफते-हांफते घर पहुंचे और उसी बिजली मिस्‍त्री को फोन लगाया जिसने मीटर में कारीगरी की थी। ''मैंने सोचा बेटा अब तो जेल हो जाएगी। उससे मैंने कहा कि भाई इसे पहले जैसा कर दो। उसने फिर से तीन हजार रुपये मांगे। मुझे देना पड़ा।'' किसी तरह मिश्राजी की जान छूटी। वे इस किस्‍से को याद कर-कर के खूब ठहाका लगाते हैं।

किस्‍सा सुनते हुए साथ में बैठे एक सज्‍जन ने टिप्‍पणी की, ''डेमोक्रेसी तो इस देश में है ही नहीं।'' मिश्राजी पलटकर बोले, ''ये देश डेमोक्रेटिक था ही कब? सब पाखंड है। अभी आप चुनावों से पुलिस और फौज हटाकर देख लीजिए, डेमोक्रेसी की पोल खुल जाएगी। साहब, लोग डर के मारे डेमोक्रेटिक बने रहते हैं वरना अफरा-तफरी मच जाए।''

''तो क्‍या पुलिस और फौज डेमोक्रेसी के लिए ज़रूरी है?''

मिश्राजी, जो इस देश में डेमोक्रेसी का होना नहीं मानते, कहते हैं, ''बिलकुल... इस देश की जनता डंडे के बल पर ठीक रहेगी। डेमोक्रेसी, सेकुलरिज्‍म, सब दिखावा है।''

''सेकुलर तो वैसे भी अब यह देश नहीं रहा?''

मिश्राजी बात पलटते हैं, ''बनारस तो सेकुलर है ही। यहां आधी आबादी हिंदू की है, आधी मुसलमान। हो गया सेकुलर। और क्‍या चाहिए।''

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पांच 

कोई गांधी को गाली दे रहा है, कोई पुलिस-फौज को ज़रूरी बता रहा है, कोई मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगल रहा है तो कोई ज़ी न्‍यूज़ और वॉट्सएप की कहानियां सुना रहा है। ऐसे में 31 जुलाई को कथासम्राट प्रेमचंद को यहां याद करने वालों की भी एक जमात है जो अपने-अपने इलाके में अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार कार्यक्रम करने में लगी है। राजेंद्र प्रसाद घाट पर 31 जुलाई की शाम एक नाटक होने की सूचना अफलातूनजी ने दी थी, जहां जाना संभव नहीं हो सका क्‍योंकि उसी शाम गिलट बाजार में रामजी यादव ने प्रेमचंद जयन्‍ती पर एक आयोजन रखा था। बनारस जाने का मेरे लिए दरअसल यही आयोजन बहाना था।

गिलट बाजार के नवरचना स्‍कूल में कार्यक्रम तय था। उसके गेट पर भाजपा के किसी नेता या कार्यकर्ता का नेमप्‍लेट लगा था। बाद में पता चला कि स्‍कूल के मालिक रामसुधार सिंह के सुपुत्र भाजपा में हैं। चार मंजिल ऊपर छत पर एक सभागार था जिसमें भारत माता से लेकर शिवाजी आदि की भरपूर तस्‍वीरें टंगी हुई थीं। समझ में आ रहा था कि यह स्‍कूल नई पीढ़ी की कैसी नवरचना कर रहा होगा। बहरहाल, कार्यक्रम शुरू हुआ और पौने तीन घंटे तक चला। रामजी यादव इलाके के कुछ पुराने लेखकों को बुला लाए थे। पत्रिका ''गांव के लोग'' की ओर से लेखक मूलचंद सोनकर का एकल काव्‍य पाठ हुआ और उस पर परिचर्चा भी हुई। कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग भी हुई। सबसे बूढ़े स्‍वरों ने सबसे मुखर भाषण दिया। शहर के इस कोने में आकर पता चला कि कुछ लेखकनुमा जीव अब भी इस शहर में बचे हुए हैं।

रामजी भाई जीवट वाले आदमी हैं। आखिरकार कार्यक्रम करा ले गए। पत्रिका भी निकाल ही ले जाएंगे। शहर में कुछ और लोग जीवट वाले हैं जो आए दिन विरोध प्रदर्शन और सम्‍मेलन कराते रहते हैं। प्रेमचंद को याद करने वालों की इस शहर में कोई कमी नहीं है। इस बार तो कायस्‍थ महासभा आदि ने भी प्रेमचंद को याद किया है। प्रेमचंद की रूह आज के बनारस में जातिवादी फील कर रही होगी। एक ओर वे लोग हैं जो विचारों और सरोकारों के नाते प्रेमचंद को याद करते हैं। दूसरी ओर उन्‍हें मैनिपुलेट करने वाली उनकी जाति के लोग हैं जो आरएसएस से विश्‍व हिंदू परिषद तक का राजनीतिक सफ़र तय कर चुके हैं। आने वाले दिन बनारस में प्रेमचंद के लिए मुफीद नहीं होंगे, इसे समझना मुश्किल नहीं है।

कुछ बातें हालांकि ऐसी हैं जो समझ में नहीं आती हैं। मसलन, जनतांत्रिक मूल्‍यों को लेकर लड़ने वाला जो छोटा सा समूह शहर में बचा है, वह उन निर्माण कर्मचारियों पर अपनी निगाह क्‍यों नहीं डालता जो सिंहद्वार पर बाएं हाथ दरी बिछाए बारिश में धरना दिए बैठे हैं। पिछली बार मैं आया था तो बीएचयू के गेट पर संविदा कर्मचारी धरने पर बैठे थे। उन्‍हें भी कोई पूछने वाला नहीं था। आखिर इस बात पर सवाल क्‍यों नहीं उठाए जाते कि प्रशासन के समानांतर कांवडि़यों की यात्रा का प्रबंधन विश्‍व हिंदू परिषद क्‍यों और कैसे कर रहा है। कांवडि़यों को भाजपा का झंडा किसने थमाया, इस पर बात क्‍यों नहीं होती। जगह-जगह विश्‍व हिंदू परिषद ने जो श्रावणी मेले का आयोजन जनता के लिए किया हुआ है, उस पर कोई सवाल क्‍यों नहीं करता।

याद है कि कुछ दिनों पहले बीएचयू में आरएसएस के पथ संचलन की तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई थीं। विश्‍वविद्यालय के कुलपति की काफी लानत-मलानत इस बात के लिए की गई थी कि उन्‍होंने इसकी अनुमति कैसे दे दी। समाजवादी पार्टी समर्थक एक पूर्व छात्र इस बारे में पूछे जाने पर मुस्‍कराते हुए कहते हैं कि ''ये तो होता ही रहता है। इसमें नया क्‍या है।'' ''क्‍या इसका कोई विरोध हुआ?'' ''नहीं तो.. विरोध काहे होगा।''

फर्ज़ ये कि बनारस में जिसका विरोध होना चाहिए, उसे चुपचाप स्‍वीकार कर लिया गया है। कथाकार काशीनाथ सिंह एक दिलचस्‍प बात कहते हैं, ''दरअसल, दो साल में यहां हुआ कुछ नहीं है। न होगा। यहां के लोगों को बस प्रधानमंत्री अपने यहां का चाहिए। इतने साल इलाहाबाद का प्रधानमंत्री देखने के बाद पहली बार मौका मिला है। बनारस के लोग इसी में खुश हैं। बाकी डेवलपमेंट हो या न हो, यह मुद्दा ही नहीं है।''

और सांप्रदायिकता? विहिप? शहर का भगवाकरण? बनारस के लोगों के पास इसका एक रटा-रटाया जवाब है। हड़हासराय में आभूषणों का कारोबार करने वाले विजय अपने तरीके से इसे स्‍वर देते हैं, ''ई सब बेकार की बात है... सारी दुनिया पैसा कमाने के पीछे पागल है लेकिन एक बनारसी आज भी इसी चक्‍कर में परेशान है कि सवेरे बढि़या कचौड़ी कहां भिड़ायी जाए।''   
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और अंत में...
  
कभी-कभी ''बेकार की बात'' सबसे काम की बात बन जा सकती है। यह भी मुमकिन है कि सावन के अंधे को सब कुछ भगवा दिख रहा हो। बेहतर है कि ऐसा ही हो, लेकिन दिल्‍ली में कांवडि़यों के हाथ का तिरंगा बनारस आकर भाजपा का झंडा बन जाए, तो यह बात सोचने लायक मानी जानी चाहिए। कोई न सोचे, तो इसका इलाज नहीं।

सोमवार को दिन भर बारिश झमाझम हुई। सारी सड़कें टूटी हुई थीं। गड्ढों में पानी भरा था। चारों ओर लाखों की संख्‍या में भगवा टी-शर्ट और पैंटधारी लिंगपूजक नौजवानों का हुजूम उमड़ा था। सावन इस बार यहां कुछ ज्‍यादा ही झूम कर आया था। जाने क्‍या बात हुई कि सोमवार को जो शहर सैलाब बना हुआ था, अगले ही दिन मंगलवार को वहां सोनिया गांधी को डीहाइड्रेशन हो गया। डीहाइड्रेशन समझते हैं न? पानी की कमी।

ऐसा होता है। कभी-कभार पानी ज्‍यादा होता है तो उसके बीच कोई पानी को तरसता भी होगा। सोमवार की शाम बनारस छोड़ते वक्‍त सोच रहा था कि क्‍या इसी बरसात के लिए मैं यहां आया था? शिवगंगा एक्‍सप्रेस साढ़े सात बजे खुली, तो उससे पहले कुछ बूंदाबांदी का माहौल बेशक बना था, लेकिन गाड़ी खुलने पर सारे बादल छंट चुके थे। मैं नहीं जानता था कि बनारस में सावन ऐसे भी आएगा, कि भीगे हुए शहर के बीच किसी की आंखों को पत्‍थर कर जाएगा। इस शहर को खुदा सलामत रखे। याद आते हैं पाकिस्‍तान के मक़बूल शायर सलीम अहमद:

निकल गए हैं जो बादल बरसने वाले थे
ये शहर आब को तरसेगा चश्‍म-ए-तर के बगैर






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