10/19/2016

गोलियथ पर डेविड की नैतिक जीत के बाद एक चुभता हुआ सवाल: कब अपना कम्‍फर्ट ज़ोन छोड़ोगे?



अहमर खान
(केंद्रीय मंत्री स्‍मृति ईरानी द्वारा अपनी शैक्षणिक योग्‍यता के संबंध में चुनाव आयोग को गलत जानकारी देने के मामले में इस देश के एक आम युवा ने अदालत से शिकायत की थी। पैंसठ करोड़ युवाओं की इस वीरभोग्‍या धरती पर उसका नाम कुछ भी हो सकता था, लेकिन यह दिल्‍ली के अहमर खान का ही साहस और संकल्‍प था कि उसने इतनी बड़ी पहल की और उसे डेढ़ साल तक अपने बेरोज़गार कंधों पर कुछ बेरोज़गार दोस्‍तों के सहारे ढोते रहे। ईसाई धर्मग्रंथ की परंपरा से उधार लें तो कह सकते हैं कि यह लड़ाई विशुद्ध डेविड बनाम गोलियथ की थी। एक केंद्रीय मंत्री बनाम एक अदद युवक की लड़ाई। ज़ाहिर है, अहमर केस हार गए और अदालतों ने उनके ऊपर केंद्रीय मंत्री के 'उत्‍पीड़न' का आरोप भी लगे हाथ मढ़ दिया। 

फैसले के अगले दिन फेसबुक पर आया अहमर खान का यह बयान बेहद अहम है। हम इसे अविकल प्रकाशित कर रहे हैं। अहमर ने हार नहीं मानी है और उन्‍होंने कुछ अहम सवाल हमारे लिए छोड़ दिए हैं। यह मुकदमा आगे दूसरी अदालतों में चले या नहीं, लेकिन स्‍वतंत्र भारत में इस बात की नज़ीर बेशक़ बन चुका है कि एक आम आदमी एक खास आदमी को उसकी ग़लतियों के लिए कानूनी तरीके से ''उत्‍पीडि़त'' कर सकता है। हम जिस दौर और देश में जी रहे हैं, उसमें यह डेविड की गोलियथ पर हुई जीत है, भले मुकम्‍मल न हो! - मॉडरेटर)





केंद्रीय वस्त्र मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष दायर अपने हलफनामे में, अपनी शैक्षिक योग्यता संबंधी गलत सूचना देने के मामले में कल पटियाला हाउस कोर्ट ने मेरी शिकायत ख़ारिज कर दी। अपने फैसले में कोर्ट ने दो सूरतों को मेरी शिकायत ख़ारिज करने की बुनियाद ठहराया। इसमें पहली है असल (original) दस्तावेजों की गैर मौजूदगी और दूसरी है मामले की शिकायत कोर्ट में दर्ज कराने में देरी होना।

न्यायालय और न्याय व्यवस्था सर्वोपरि है, किसी भी हाल में उसको स्वीकार करना होगा लेकिन ये फैसला आखिरी नहीं है न्यायपालिका के अन्य विकल्प अभी खुले हैं। कई सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है। श्रीमती स्मृति ईरानी का 2004 वाला हलफनामा चुनाव आयोग के पास मिल नहीं सका है जिसमें उन्होंने अपने आप को बीए पास बताया था, साथ ही उनके 1996 में बीए पास संबंधी दस्तावेज़ भी दिल्ली युनिवर्सिटी को नहीं मिले है। यहां मैं एक बात बता दूं कि स्कूल ऑफ़ ओपेन लर्निंग (SOL) के पास 1962 से लेकर अब तक का रिकॉर्ड मौजूद है- यह बात अंदाज़े से नहीं कह रहा हूं बल्कि यह बात मुझे वहीँ के एक अधिकारी ने बताई थी जब मैं खुद अपनी डिग्री वहां से निकलवाने गया था। हाल में ही प्रधानमंत्रीजी की 1972 की डिग्री का वहां से मिलना भी इसका एक उदाहरण माना जा सकता है।

इलेक्शन कमीशन ने 2004 के हलफनामे की जो सत्यापित (verified) कॉपी कोर्ट में जमा की है उसको कोर्ट ने मात्र फोटोकॉपी मानते हुए उसकी विश्वसनीयता पर संदेह ज़ाहिर करते हुए उसे नहीं माना है यहां गौरतलब बात यह है कि यह फोटो कॉपी/सूबूत मैंने नहीं बनाये हैं बल्कि भारत के इलेक्शन कमीशन ने कोर्ट में जमा किए हैं। दूसरी बात, यह कानूनी रूप से भी मान्य है कि जिस तारीख़ से वो हलफनामा मेरी जानकारी में आया उसी तारीख से उसकी समय सीमा (time limitation) शुरू होती है। ज़ाहिर है, मैं इस फैसले से संतुष्ट नहीं हूं।

इस फैसले को आने में और इस न्यायिक प्रक्रिया में लगभग डेढ़ साल लग गए। इन डेढ़ वर्षों के दौरान हर तारीख़ पर मेरा सशरीर कोर्ट मौजूद होना ज़रूरी था शहर से बाहर होने के कारण एक बार कोर्ट में अनुपस्थित होने पर एक हज़ार रुपया जुर्माना भी मैं दे चुका हूं। इस मामले में आखिरी जिरह (final argument) होने के बाद फैसला आने में लगभग डेढ़ महीना और कुल पांच तारीखें लगीं जिसमें सुबह दस बजे से (केस सुबह 10 बजे listed होता था, लेकिन तीन बजे के लिए रख दिया जाता था) शाम चार बजे तक मैं और मेरा साथी नलिन कोर्ट परिसर में टाइम किल करते थे। मैं समझ सकता हूं कि न्यायिक प्रक्रिया का अपना एक अनुशासन और नियम व्यवस्था होती है। यहां मेरा मकसद सिर्फ अपनों को अपने कष्ट और संघर्ष के अनुभव का अहसास करवाना है।

आज के फैसले में जब मैं इस लाइन को पढ़ता हूं तो अपने लोकतंत्र पर इतराने को जी करता है, कि मेरे जैसा मामूली आदमी जो अपने रोज़गार और कोर्ट के बीच लेफ्ट-राइट कर रहा है वह केंद्र सरकार में बैठी मिनिस्टर को उत्पीड़ित भी कर सकता है! वह उत्पीड़ित कर सकता है उसे, जो भारत सरकार के उच्चतम पद में से एक पर आसीन है; जिसने इस मामले में कभी जनता के समक्ष अपना पक्ष रख जनप्रतिनिधि होने की अपनी जवाबदेही सुनिश्चित न की हो; जिसने एक बार भी कोर्ट का मुंह न देखा हो; जो ज़ेड प्लस सुरक्षा में सुरक्षित हो; जिसके हाथों में दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की सारी ताकतें हों!!!

क्या एक आम नागरिक का अपने प्रतिनिधि से सवाल करना, उसके सही गलत पर जवाबदेही की मांग करना उत्पीड़न हो सकता है?

मैं नलिन से बात कर रहा था कि आदर्श उत्पीड़क मेरे जैसा होना चाहिए जो घर से एक बार निकलता हो तो घरवाले दस बार फ़ोन कर पूछते हों कि कहां हो, कितने बजे घर पहुंचोगे; जिसकी नौकरी और भविष्य का कोई ठिकाना न हो; जिससे हर जगह एक ही सवाल पूछा जाता हो कि ऐसा करने से क्या हासिल कर लोगे और हर जवाब झुंझलाहट भरे सवाल में बदल जाता हो कि आप लोग ऐसी कोशिश कभी क्यों नहीं करते? क्यों बस शिकायत करते हो? व्यवस्था की खराबी का रोना रोते हो? कब अपना कम्फर्ट जोन छोड़ोगे?

अपनी मार्कशीट में अपने नाम में एक अदद नुक्ते या कॉमा की गलती होने पर अपना भविष्य व अपनी नौकरी गंवा देने वाले सत्ता से डरे हुए लोग जब मेरे जवाब में कहते हैं कि मामला बस गलत शैक्षणिक योग्यता लिखने का है, तो मुझे हैरानी होती है।

मैंने इस मामले में आख़िर तक जाने का फैसला कर लिया हैयह मेरी निजी हार नहीं है यह मामला है मेरे और मेरे जैसे उन लोगो के विश्वास का, जो मानते है कि हमारे देश में आज भी विधि का शासन है; जो मानते हैं कि यहां कोई मिनिस्टर हो या आम आदमी, कानून के समक्ष सब एक समान हैं। एक आम नागरिक भी एक मिनिस्टर से जवाब मांग सकता हैउस पर सवाल खड़ा कर सकता है।

मैं हार नहीं मानूंगा। इंसाफ ज़रूर होगा। 

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

अबे उल्लू यहाँ कानून सबके लिए सिर्फ किताबो में बराबर है. सलमान खान कोई स्म्रिरती ईरानी से भी बड़ा आदमी है के.

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